बस्ती। राष्ट्रीय स्तर पर तैयार की जाने वाली योजना धरातल पर आकर कैसे दम तोड़ देती है, इसकी बानगी ई-नाम योजना से बढ़कर कुछ नहीं है। किसानों को प्रतिस्पर्धा में लाकर उनकी उपज का अधिकतम मूल्य दिलाने के लिए केंद्र सरकार ने 2016 में इसकी शुरुआत की। मगर जिम्मेदारों ने योजना के क्रियान्वन में ऐसा बंटाधार किया कि उसके मायने ही बदल गए।
इसमें गांव में बैठे किसान को भी राष्ट्रीय स्तर की मंडी में अपनी उपज की बोली लगवाने का प्लेटफाॅर्म मुहैया कराना था। किंतु, काल्पनिक किसानों से खरीद दिखाकर असली किसानों को प्रतिस्पर्धा से बाहर करने का एक तरह से कुचक्र रच दिया गया। इसका फायदा बिचौलिए उठाकर मालामाल हो रहे हैं।
तथ्य खंगालने पर पता चला कि शासन प्रशासन की आंख में धूल झोंकने के लिए काल्पनिक किसानों के उपज की बोली लगवाकर खरीद-बिक्री दिखा दी गई। मगर जिन किसानों से खरीद दिखाई गई, उनके खाते में डीबीटी भी नहीं की गई। योजना के जानकार बताते हैं कि इसमें यदि वास्तव में खरीद होगी तो विक्रेता के बैंक खाते में उसका ऑनलाइन भुगतान भेजा जाएगा।
साथ ही क्रेता व्यापारी द्वारा विक्रेता बाउचर भी जारी किया जाएग, जिसके आधार पर विभाग को राजस्व के रूप में डेढ़ प्रतिशत शुल्क प्राप्त होगा। पोर्टल पर दर्ज आंकड़ों की बात करें तो एक अगस्त को अगई के किसान राहुल से 10 क्विंटल धान, कटाए के किसान संतोष से 19 क्विंटल धान, कसैला के द्वारिकाधीश से 29 क्विंटल धान, वाल्टरगंज के भरत से 16 क्विंटल धान, छितौनी के सूरज से 26 क्विंटल गेहूं सहित अन्य किसानों से खरीद की गई।
छानबीन करने पर पता चला कि इस नाम के किसान उन स्थानों पर हैं ही नहीं। यानी यह खरीद सिर्फ कागजों में हो गई, वास्तव में ऐसा कुछ हुआ ही नहीं। यह तो सिर्फ एक दिन का उदाहरण मात्र है। 2016 से लेकर हर महीने इस तरह से काल्पनिक किसानों की खरीद-बिक्री दिखाई गई है।
इसके क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार के द्वारा प्रदेश सरकार के माध्यम से मंडी परिषद के कृषि विपणन एवं विदेश व्यापार विभाग को अच्छी-खासी धनराशि उपलब्ध कराई जा रही है, जिसके स्थानीय स्तर संचालन का जिम्मा कृषि विपणन एवं विदेश व्यापार विभाग के कृषि विपणन निरीक्षक (एसएमआई) को सौंपा गया है।