'खुद लाखों कमाते हैं'
कुछ महिलाएं सुबह सात बजे आवासीय सोसायटी के बाहर इकट्ठा हुईं। एक कामगार ने कहा कि उन्होंने पिछले दिनों के विरोध के वीडियो देखे थे। इसके बाद उन्हें एहसास हुआ कि उनका वेतन भी कई साल से नहीं बढ़ा है। उन्होंने कहा कि उन्हें न्यूनतम मजदूरी के सरकारी नियमों की जानकारी नहीं थी। ये खुद तो लाखों रुपये महीना कमाते हैं तो फिर हमारी तनख्वा क्यों नहीं बढ़ाते।
'सरकार ने 700 रुपये प्रतिदिन तक की है'
कामगारों ने कहा कि सरकार ने कारखाने के श्रमिकों के लिए प्रतिदिन 700 रुपये की सीमा तय की है। उन्होंने पूछा कि वे इस नियम के तहत क्यों नहीं आती हैं। अर्चना के अनुसार, क्लियो काउंटी में अधिकांश घरेलू कामगार गढ़ी चौकखंडी से आती हैं। जो सोसायटी के ठीक सामने है।
कामगारों की वर्तमान स्थिति
घरेलू सहायिका अर्चना ने बताया कि इन घरों में करीब 1,500 से 2,000 महिलाएं काम करती हैं। उन्हें एक घर से खाना बनाने और सफाई के लिए अधिकतम 3,000 रुपये मिलते हैं। जब उन्होंने नियोक्ताओं से 1,000 रुपये वेतन बढ़ाने को कहा तो नियोक्ताओं ने उन्हें सोसायटी में प्रवेश से रोकने की धमकी दी।
न्यूनतम मजदूरी की मांग
कामगारों का कहना है कि पिछले कुछ साल से उनका वेतन नहीं बढ़ा है। बढ़ती महंगाई के कारण मौजूदा 3,000 रुपये में गुजारा करना कठिन है। वे अपने काम के लिए उचित भुगतान की मांग कर रही हैं। उन्होंने सरकार से घरेलू कामगारों को भी न्यूनतम मजदूरी के दायरे में लाने की अपील की है।
घरेलू सहायिकाओं के बयान
1- घर में साफ-सफाई और खाना बनाने के लिए सिर्फ तीन हजार रुपये ही मिलते हैं। इतने में घर चलाना बेहद मश्किल है।
-रामश्री
2- थोड़ी सी पगार में दिनभर काम कराया जाता है। जब छुट्टी मांगी जाती है तो पगार काटने की बात बोलकर इन्कार कर दिया जाता है।
-अर्चना गोयल
3- थोड़ी सी भी देर होने पर पगार काट दी जाती है। जरा सी भी रिआयत हीं दी जाती।
-मीना देवी
4- मैं पांच साल से काम कर रही हूं इस बीच सिर्फ दो बार पगार में बढ़ोतरी हुई है। हर साल बढ़ोतरी करनी चाहिए।
-शारदा
5- नियम के अनुसार हमारी भी पगार तय होनी चाहिए। तय पगार होने से आर्थिक दबाव कम होगा।
-काजल