खंडपीठ ने हालांकि उक्त महिला अधिकारी को राहत प्रदान की है। वहीं महिला ने जिस वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ आरोप लगाए थे उसे भी राहत प्रदान की है। अदालत ने कहा उक्त अधिकारी करीब पांच वर्ष पहले ही अवकाशग्रहन कर चुका है ऐसे में उसके खिलाफ अब विभागीय कार्रवाई का आदेश देने का कोई औचित्य नहीं है।
अदालत ने कहा हमें इन दोनों तथ्यों को दरकिनार करने में कोई संकोच नहीं है, विशेष रूप से जांच कमेटी के निष्कर्ष के आलोक में कि इस घटना की शिकायत वास्तव में हुई थी। खंडपीठ ने कहा कि लिंगभेद के चलते ही महिलाओं के प्रति गलत व्यवहार होता है।
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 ने एक अस्वस्थ और दमनकारी घरेलू वातावरण के खिलाफ ढाल प्रदान की है। इसी के चलते 1999 में 'विशाखा दिशानिर्देश' आए। प्रत्येक संस्था और संगठन को लैंगिक संवेदनहीनता के लिए जीरो टॉलरेंस की घोषणा करनी चाहिए। महिलाओं को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए एक कानून है तो कानून का अक्षरश पालन किया जाना चाहिए ।
महिला ने आरोप लगाया था कि 7 जुलाई 2011 को उसके वरिष्ठ अधिकारी ने उसे यौन संबंधी बाते की और पुरुष शौचालय का प्रयोग करने के लिए कहा। इतना ही नहीं अधिकारी ने कई अन्य स्टाफ के सामने भी उससे आपत्तिजनक भाषा में बात की।
उसने इसकी विभाग में शिकायत की तो उसे लिखित में शिकायत मांगी गई व उसने दे दी। इसके बाद जांच कमेटी का गठन किया गया और कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि याची यौन आरोप संबंधी साक्ष्य पेश नहीं कर पाई। हालांकि कमेटी ने माहौल को ठीक रखने के लिए दोनों के तबादले की सिफारिश कर दी।
याची की अधिवक्ता कामना वोहरा ने खंडपीठ के समक्ष तर्क रखा कि सिंगल जज व जांच कमेटी ने सही तरीके से उनकी मुवक्किला का पक्ष नहीं सुना। उन्होंने जांच कमेटी के समक्ष अन्य महिला गवाह ने स्पष्ट रूप से कहा है कि उनके सामने आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया गया था, बावजूद इसके उसके बयान पर ध्यान नहीं दिया गया।
इतना ही नहीं आरोपी ने अपने तबादले संबंधी सिफारिश को चुनौती तक नहीं दी। इतना ही नहीं उनकी मुवक्किला अपनी प्रतिष्ठा को दाव पर लगा कर क्यों फर्जी शिकायत करेगी। ऐसे में सिंगल जज के फैसले को रद्द कर वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ विभाग कार्रवाई का निर्देश दिया जाए।