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Noida News: बिना मान्यता बीफार्म में दाखिले का मामला आयोग ने किया निरस्त

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पिता ने दायर किया था वाद, उपभोक्ता नहीं होने के आधार पर आयोग ने खारिज की शिकायत
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संवाद न्यूज एजेंसी
ग्रेटर नोएडा। मान्यता नहीं होने के बावजूद बी फार्मा पाठ्यक्रम में दाखिला देने और फीस वसूलने के मामले में जिला उपभोक्ता आयोग ने छात्र के पिता की ओर से दायर वाद को निरस्त कर दिया। आयोग ने अपने फैसले में कहा कि दाखिला छात्र का हुआ था, इसलिए शिकायत भी उसी की ओर से दायर की जानी चाहिए थी। पिता ने स्वयं को वाद दायर करने का कानूनी अधिकार देने वाला कोई दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किया। मामले की सुनवाई आयोग के अध्यक्ष अनिल कुमार पुंडीर और सदस्य अंजु शर्मा ने सुनवाई की।
ग्राम अच्छेजा निवासी देवेंद्र नागर ने अपने बेटे शिवेन नागर का शैक्षणिक सत्र 2024-25 में दादरी स्थित विश्वैश्वर्या ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन में बीफार्मा पाठ्यक्रम में दाखिला कराया था। आरोप है कि संस्थान के प्रवेश अधिकारी ने दाखिले की फीस 1.18 लाख रुपये बताई थी। इसके अलावा, सालाना 50 हजार रुपये अतिरिक्त देने पर प्लेसमेंट के माध्यम से नौकरी दिलाने का आश्वासन भी दिया गया था। बताया गया था कि पाठ्यक्रम के अंतिम वर्ष में 20 से 50 हजार रुपये प्रतिमाह तक का वेतन मिल सकता है। पहले वर्ष के लिए कुल 1.68 लाख रुपये और इसके बाद प्रत्येक वर्ष 1.50 लाख रुपये फीस बताई गई थी।
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उन्होंने संस्थान में कुल 1.48 लाख रुपये जमा किए, जिसकी रसीद भी उन्हें दी गई। उनके बेटे की पहले सेमेस्टर की परीक्षा करा दी गई, लेकिन परिणाम घोषित नहीं किया गया। इस संबंध में जानकारी जुटाने पर उन्हें पता चला कि संबंधित शैक्षणिक सत्र 2024-25 में संस्थान को बीफार्मा पाठ्यक्रम संचालित करने की मान्यता नहीं थी। इसके बाद उन्होंने संस्थान पर कथित रूप से धोखाधड़ी कर फीस वसूलने का आरोप लगाते हुए जिला उपभोक्ता आयोग में वाद दायर किया।
सुनवाई के दौरान कॉलेज की ओर से अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके चलते एक पक्षीय सुनवाई हुई। आयोग ने उपलब्ध साक्ष्यों और अभिलेखों पर विचार करने के बाद पाया कि वाद छात्र के पिता की ओर से दायर किया गया था, जबकि दाखिला उनके बेटे का हुआ था।
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आयोग ने माना कि शिकायतकर्ता स्वयं इस मामले में उपभोक्ता नहीं हैं। उन्होंने ऐसा कोई कानूनी दस्तावेज, शपथपत्र या हलफनामा भी प्रस्तुत नहीं किया, जिससे यह साबित हो कि उनके बेटे ने उन्हें अपनी ओर से वाद दायर करने का अधिकार दिया था। इसी आधार पर आयोग ने वाद को निरस्त कर दिया।
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