गौतमबुद्धनगर की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) अदालत ने गैंगस्टर रवि नागर उर्फ रवि काना के खिलाफ बी-वारंट के बावजूद आरोपी की रिहाई के मामले में जिला कारागार बांदा के जेल अधीक्षक पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने इसे गंभीर प्रशासनिक लापरवाही मानते हुए जेल अधीक्षक को आदेश दिया है कि वह पूरे मामले में स्पष्ट एवं तथ्यात्मक स्पष्टीकरण के साथ आख्या 6 फरवरी 2026 तक न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें। साथ ही यह भी पूछा गया है कि क्यों न आरोपी के जेल कस्टडी से भागने के संबंध में उनके विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया जाए।
मामला थाना सेक्टर-63 नोएडा से संबंधित है। जहां आरोपी के खिलाफ इस साल भारतीय न्याय संहिता की धारा-308(5) (जबरन वसूली), 351(2) (आपराधिक धमकी) एवं 3(5) के तहत आरोपी रविन्द्र सिंह उर्फ रवि नागर उर्फ रवि काना को नामजद किया गया है। आरोपी उस समय अन्य मामलों में जिला कारागार बांदा में बंद था। इस प्रकरण में आरोपी को बी-वारंट के जरिए न्यायालय में तलब किया गया था और विवेचक द्वारा रिमांड स्वीकृत कराने के लिए प्रार्थना-पत्र भी प्रस्तुत किया गया था।
न्यायालय के आदेशानुसार 29 जनवरी 2026 को आरोपी की पेशी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जिला कारागार बांदा से कराई गई। इसी दौरान रिमांड को लेकर सुनवाई भी हुई। इसके बावजूद उसी दिन शाम को आरोपी को जेल से रिहा कर दिया गया। जब यह तथ्य न्यायालय के संज्ञान में आया तो अदालत ने इसे अत्यंत गंभीर माना।
जेल से रिहा हुआ है आरोपी
जेल अधीक्षक द्वारा न्यायालय को भेजे गए पत्र में बताया गया कि आरोपी को प्रशासनिक आधार पर अगस्त 2024 में गौतमबुद्धनगर से बांदा कारागार स्थानांतरित किया गया था। 28 जनवरी 2026 को संबंधित प्रकरण का बी-वारंट कारागार को प्राप्त हुआ था। जिसमें 29 जनवरी को न्यायालय के समक्ष पेश करने का आदेश था। पुलिस गार्ड उपलब्ध न होने के कारण आरोपी को वीसी के माध्यम से पेश किया गया। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि आरोपी के खिलाफ अन्य सभी मामलों में रिहाई आदेश पहले ही प्राप्त हो चुके थे। वह केवल बी-वारंट के आधार पर ही बंद था। वहीं जेल प्रशासन का कहना है कि वीसी पेशी के बाद न तो अभिरक्षा वारंट प्राप्त हुआ और न ही अग्रिम पेशी तिथि की कोई सूचना मिली।
इसी आधार पर 29 जनवरी-2026 यानी बृहस्पतिवार को शाम 6:39 बजे आरोपी को रिहा कर दिया गया। वर्तमान में आरोपी जिला कारागार बांदा में बंद नहीं है। हालांकि न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार्य मानते हुए कहा कि जब जेल प्रशासन को पहले से जानकारी थी कि आरोपी बी-वारंट पर तलब है और उसी दिन रिमांड को लेकर सुनवाई भी हुई, तो ऐसे में आरोपी को रिहा करना न्यायिक आदेशों की अवहेलना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना न्यायालय की अनुमति एवं सूचना के आरोपी को छोड़ना गंभीर चूक है, जो न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करती है। वहीं जेल से छूटने के बाद कहां आरोपी कहा गया नोएडा पुलिस को नहीं पता। फिलहाल पुलिस आरोपी के संपर्क में रहे लोगों की तलाश कर रही है।
डीआईजी जेल और डीजी जेल को भी दी गई प्रकरण
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने जेल अधीक्षक से तीन प्रमुख बिंदुओं पर जवाब मांगा है। पहला, जब बी-वारंट की जानकारी पहले से थी तो किन परिस्थितियों और किस आधार पर आरोपी को रिहा किया गया। दूसरा वीसी के माध्यम से रिमांड की कार्यवाही चलने के बावजूद न्यायालय को सूचित किए बिना अभियुक्त को क्यों छोड़ा गया। तीसरा क्यों न इस कृत्य को अभियुक्त के जेल कस्टडी से भागने की श्रेणी में मानते हुए जेल अधीक्षक के विरुद्ध मुकदमा चलाया जाए। अदालत ने इस पूरे प्रकरण की जानकारी डीआईजी जेल और डीजी जेल को भी भेजी है ताकि आवश्यक स्तर पर जांच और कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
क्या है बी-वारंट
बी-वारंट अदालत द्वारा जारी किया जाने वाला ऐसा वारंट होता है। जिसके जरिए पहले से किसी अन्य मुकदमे में जेल में बंद आरोपी को किसी दूसरे मामले में पेश करने के लिए कोर्ट में तलब किया जाता है। जब किसी आरोपी के खिलाफ एक से अधिक मामले दर्ज होते हैं और वह किसी एक केस में न्यायिक हिरासत में होता है। तब संबंधित अदालत जेल अधीक्षक को बी-वारंट जारी कर आरोपी की पेशी सुनिश्चित कराती है। बी-वारंट के आधार पर जेल प्रशासन आरोपी को तय तारीख पर पुलिस अभिरक्षा या जेल वैन के माध्यम से अदालत में पेश करता है। आमतौर पर बी-वारंट को प्रोडक्शन वारंट भी कहा जाता है। जबकि ए-वारंट बाहर खुले घूम रहे आरोपी की गिरफ्तारी के लिए जारी किया जाता है।