जिम्स के बाल रोग विभाग के आईसीयू में इन दिनों एक 12 वर्ष का बच्चा भर्ती है। उसकी हालत मधुमेह के चलते बिगड़ गई थी। उपचार के बाद अब बच्चे की तबियत में सुधार है। संस्थान की बाल रोग विभाग की विभागध्यक्ष डॉ. अनीता कुमारी कहती हैं कि यह सिर्फ एक मामला नहीं है। बच्चों में मधुमेह के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। प्रत्येक महीने चार से पांच मामले ऐसे आ रहे हैं जिनमें तबियत बिगड़ने पर बच्चे को भर्ती तक करना पड़ता है। जो बच्चा यहां आईसीयू में भर्ती है। उसका इलाज चल रहा है और पहले उसकी हालत में सुधार है।
बच्चों में मोटापा, जिससे भी पैदा होती समस्या
डॉ. अनीता कहती हैं कि बच्चों को आजकल आसानी से हाई कैलोरी, हाई फैट और प्रोसेस्ड खाना आसानी से उपलब्ध है। बच्चे इनको ज्यादा खाना पसंद कर रहे हैं। प्राकृतिक खाना कम पसंद करते हैं। साथ ही शारीरिक गतिविधि भी कम हो गई है जिससे जितना खाते हैं उतनी शुगर को कंज्यूम नहीं कर पाते हैं। जिससे मोटापा बढ़ता है और मधुमेह की समस्या भी।
बच्चों और बडों के मधुमेह में फर्क है
बड़ों में टाइप टू डायबिटीज होता है। बच्चों के मामलों में इंसुलिन की कमी होने लग जाती है। इंसुलिन बनाने वाला पैनक्रियाज इसे बनाना बंद कर देता है। इसके बहुत से कारण हो सकते हैं। इसी के चलते दोनों का उपचार भी अलग है।
माता-पिता स्वीकारते नहीं बच्चे को मधुमेह है
जिम्स में बाल रोग विभाग में ऐसे भी मामले आए जिसमें माता-पिता स्वीकार ही नहीं कर पाए कि बच्चा मधुमेह से पीड़ित है। डॉ. अनीता कहती हैं कि कई मामलों में जब अभिभावकों को बताया गया तो उनका जवाब था कि यह कैसे हो सकता है। यह तो बड़ों की बीमारी है। स्वीकार्यता की कमी के चलते वह आयुर्वेदिक दवा या कुछ मामलों में झाड़फूंक वालों तक के पास चले जाते हैं। इससे स्थिति और बिगड़ जाती है। कुछ महीने बाद जब वह वापस आते हैं तो केस बिगड़ चुका होता है।