कुरुक्षेत्र। अतिरिक्त जिला जज अनिल कुमार की अदालत ने नरेंद्र कुमार (मृतक) के कानूनी वारिसों की अपील को खारिज कर दिया, जो 21 दिसंबर 2018 को सिविल जज (जूनियर डिवीजन) पिहोवा की ओर से पारित निर्णय के खिलाफ दायर की गई थी। निचली अदालत ने वादी का मुकदमा खारिज कर दिया था जिसमें 14 दिसंबर 2010 के बिक्री विलेख को रद्द करने की मांग की गई थी।
वादी के कानूनी वारिसों ने दावा किया कि प्रतिवादी लीला राम के पास उनके खसरे में कोई वैध स्वामित्व नहीं था। इसके बाद भी लीला राम ने दूसरे प्रतिवादी अमर लाल को 10 वर्ग गज भूमि धोखाधड़ी से बेच दी। यह बिक्री विलेख कथित तौर पर 2004 में दायर एक पूर्व मुकदमे के निर्णय को प्रभावित करने के लिए बनाया गया जिसमें वादी को कब्जा और किराया वसूली का अधिकार मिला था। वादी ने तर्क दिया कि लीला राम सह-स्वामी होने के बावजूद उनके खसरे में विशेष कब्जे में नहीं था, इसलिए बिक्री विलेख अवैध और शून्य है।
प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि लीला राम सह-स्वामी थे और उन्होंने 1992 में नरेंद्र और हरिंदर कुमार से दो कनाल 14 मरला भूमि खरीदी थी। अमर लाल ने 2010 में लीला राम से 10 वर्ग गज खरीदा जिसका पंजीकृत बिक्री विलेख और म्यूटेशन वैध था। उन्होंने कहा कि सह-स्वामी अपनी अविभाजित हिस्सेदारी बेच सकता है और वादी का उपाय केवल विभाजन का मुकदमा दायर करना है न कि बिक्री विलेख को रद्द करना।
अदालत ने पाया कि बिक्री विलेख सह-स्वामी की अविभाजित हिस्सेदारी का हस्तांतरण था, जो कानूनन वैध है। 2017 में वादी को कब्जा वापस मिलने के कारण निषेधाज्ञा की मांग अप्रासंगिक हो गई। धोखाधड़ी के आरोप बिना सबूत के रहे। निचली अदालत के निर्णय को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी गई।