सीजेपी धरने के आरोप में जीबीयू छात्र अक्षत को पांच लाख के बॉन्ड का जारी हुआ था नोटिस
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय (जीबीयू) के बीए-एलएलबी छात्र अक्षत त्रिपाठी प्रकरण में एसीपी के खिलाफ मामले की जांच चल रही है। वहीं दरोगा शिव पांडे को निलंबित किया गया था। मामला जुलाई में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की ओर से दिल्ली के जंतर-मंतर पर किए गए प्रदर्शन और ग्रेटर नोएडा में प्रस्तावित धरने से जुड़ा है। छात्र पर विश्वविद्यालय के अन्य छात्रों को प्रस्तावित सीजेपी धरने में शामिल होने के लिए कथित तौर पर प्रेरित करने और सरकार विरोधी भ्रामक बातें फैलाने के आरोप में कार्रवाई की गई थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उसे जारी पांच लाख रुपये के बॉन्ड का नोटिस वापस ले लिया गया था।
मामले की शुरुआत चार सितंबर को हुई। ग्रेनो के कार्यपालक मजिस्ट्रेट-तृतीय की ओर से अक्षत त्रिपाठी को जारी नोटिस में आरोप लगाया गया कि वह विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैलाकर उन्हें प्रस्तावित सीजेपी धरने में शामिल होने के लिए उकसा रहा था। जिससे शांति व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी। नोटिस में अक्षत को छह महीने तक शांति बनाए रखने के लिए पांच लाख रुपये का निजी मुचलका और पांच-पांच लाख रुपये के दो जमानती देने को कहा गया था। उसे पांच सितंबर को पेश होने के लिए कहा गया था।
अक्षत ने आरोपों से किया था इन्कार
अक्षत ने पुलिस के आरोपों को गलत बताया था। उसका कहना था कि वह पिछले करीब तीन महीने से विश्वविद्यालय नहीं गया था। उसके अनुसार 25 मई से दो महीने की छुट्टी थी और इसके बाद विश्वविद्यालय में मरम्मत कार्य के कारण कक्षाएं ऑनलाइन चल रही थीं। अक्षत की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में यह भी कहा गया कि नोटिस में किसी विशेष घटना, बयान, तारीख या समय का उल्लेख नहीं किया गया था, जिसके आधार पर उसके खिलाफ ऐसी कार्रवाई की जा सके। उसने खुद को स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) की उत्तर प्रदेश समिति का सदस्य बताया था।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश से जुड़ा था विवाद
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि सुप्रीम कोर्ट ने एक सितंबर को सीजेपी के नेतृत्व में जुलाई में हुए प्रदर्शन से जुड़े छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को लेकर आदेश दिया था। अदालत ने संबंधित छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था। इसी के कुछ दिन बाद अक्षत को बॉन्ड नोटिस जारी किया गया।जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने नोटिस जारी होने पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि जब पहले ही स्पष्ट आदेश दिया जा चुका है कि छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस कैसे जारी हुआ। पुलिस ने बाद में स्पष्ट किया था कि नोटिस चार सितंबर को जारी हुआ था और अधिकारियों के संज्ञान में आने के बाद पांच सितंबर को उसे निरस्त कर दिया गया था।