दो सौ बीघा जमीन के 18 पट्टों का आवंटन निरस्त
अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) की कोर्ट ने रोजा याकूबपुर गांव के मामले में दिया आदेश
वर्ष 1995 में दादरी तहसील प्रशासन ने किया था 18 पट्टों का आवंटन, काफी अनियमितताएं मिलीं
पट्टाधारकों में कई अपात्र, कागजात में भी बरती अनियमितता, स्वीकृति पर नहीं मिले एसडीएम के हस्ताक्षर
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) की कोर्ट ने रोजा याकूबपुर गांव के 18 पट्टाें का आवंटन निरस्त कर दिया है। करीब 28 वर्ष पहले नियमों के खिलाफ इन पट्टों का आवंटन किया गया था। आवंटन में अनियमितता मिली, साथ ही कुछ अपात्रों को पट्टे दिए गए थे। तत्कालीन उप प्रधान और ग्राम पंचायत के एक सदस्य ने इसकी शिकायत की थी। एडीएम कोर्ट ने दादरी तहसील के राजस्व अधिकारियों को पट्टों की करीब 200 बीघा जमीन को राज्य सरकार के नाम दर्ज करने का आदेश दिया है।
जिला शासकीय अधिवक्ता (राजस्व) चरणजीत नागर ने बताया कि वर्ष 1995 में ग्रेनो के याकूबपुर गांव में 18 कृषि पट्टाें का आवंटन हुआ था। उप प्रधान इरशाद अहमद और सदस्य देवेंद्र कुमार ने पट्टों के आवंटन में गड़बड़ी होने की शिकायत जिलाधिकारी से की। वर्ष 1997 में गाजियाबाद के जिलाधिकारी की कोर्ट में मामला दर्ज हुआ। गौतमबुद्ध नगर जिला बनने के बाद वाद यहां ट्रांसफर कर दिया गया। वर्ष 2005 में जिलाधिकारी की कोर्ट ने सुनवाई के पट्टों का आवंटन निरस्त कर दिया। पट्टाधारकों ने आदेश के खिलाफ मेरठ कमिश्नर की कोर्ट में अपील दायर की। वर्ष 2007 में मेरठ कमिश्नर की कोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया और डीएम के आदेश को लागू रहने दिया।
नागर ने बताया कि वर्ष 2009 में पट्टाधारकों ने हाईकोर्ट में अपील की। वर्ष 2017 में हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी और मेरठ कमिश्नर के आदेश को खारिज कर दिया और प्रशासन को फिर से मामले में सुनवाई करने का आदेश दिया। वर्ष 2019 से एडीएम कोर्ट में पट्टों के आवंटन पर फिर से सुनवाई शुरू हुई। सभी पक्षों को सुनने के बाद एडीएम वंदिता श्रीवास्तव की कोर्ट ने पट्टों का आवंटन नियमों के खिलाफ पाया। कोर्ट ने पट्टों का आवंटन निरस्त कर दिया है, साथ ही राजस्व टीम से पट्टों की जमीन को दस्तावेज में राज्य सरकार के नाम दर्ज करने का आदेश दिया है।
-
किसी के पास थी सरकारी नौकरी तो कोई गांव का नहीं था निवासी
जिला शासकीय अधिवक्ता ने बताया कि जिस समय पट्टाधारकों की सूची बनी थी,उस समय सभी के नाम सहीं थे, लेकिन बाद में काफी में अदाला-बदली हो गई और अपात्रों के नाम जोड़ दिए गए। पट्टाधारकों में किसी के पास सरकारी नौकरी थी तो कोई गांव का निवासी नहीं था। विपक्ष इसका साक्ष्य नहीं दे सका। हालांकि कुछ पट्टाधारक पात्र थे, लेकिन पट्टों के आवंटन की प्रक्रिया में भी अनियमितता बरती गई। कार्रवाई रजिस्टर में ओवरराइटिंग थी।
-
तत्कालीन एसडीएम के हस्ताक्षर नहीं थे
नागर ने बताया कि पट्टों के आवंटन की स्वीकृति दस्तावेज पर तत्कालीन एसडीएम खजान सिंह के हस्ताक्षर नहीं थे। विपक्ष की तरफ से दस्तावेज की प्रतिलिपि दाखिल की थी, जिस पर तत्कालीन एसडीएम के हस्ताक्षर थे। कोर्ट के समक्ष उपस्थित होकर तत्कालीन एसडीएम ने हस्ताक्षर अपने होने की पुष्टि की, लेकिन कोर्ट ने उनके इस दावे को स्वीकार नहीं किया। इस कारण तत्कालीन एसडीएम का सेवानिवृत्त होना है।