नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक फैसले में 2005 के नाबालिग से दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम-2013 से पहले के मामलों में अभियोजन पक्ष को यह साबित करना अनिवार्य है कि पीड़िता की आयु 16 वर्ष से कम थी। उस समय भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धारा 375 के तहत सहमति की आयु 16 वर्ष थी, जो 2013 के संशोधन के बाद 18 वर्ष कर दी गई।न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को पांच वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। घटना 2005 की है, जब कथित तौर पर 11 वर्षीय लड़की के साथ दुष्कर्म हुआ था। आरोपी ने 2007 में अपील दायर की थी, जिसके दौरान 2008 में उसकी सजा निलंबित कर दी गई थी। ब्यूरो