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ग्रेटर नोएडा: गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय प्रशासन ने खोलनी शुरु की घोटाले की परतें, 10 सदस्यीय समिति करेगी जांच

Mon, 19 Oct 2026 09:47 AM IST
Vijay Singh Pundir अंकुर त्रिपाठी, अमर उजाला, ग्रेटर नोएडा

सार

अप्रैल 2025 में वित्तीय वर्ष 2024-25 के रिकॉर्ड के मिलान के दौरान पांच करोड़ रुपये से अधिक की फीस संबंधी कथित अनियमितता सामने आई थी। आरोप है कि छात्रों से प्राप्त फीस का भुगतान विश्वविद्यालय के सॉफ्टवेयर में दर्ज था, लेकिन संबंधित रकम आधिकारिक बैंक खातों में जमा नहीं मिली।
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गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (जीबीयू) में पांच करोड़ रुपये से अधिक के कथित फीस घोटाले की परतें खुलने के बाद प्रशासन पुराने मामलों को भी खोजने में लगा है। जीबीयू प्रशासन की पांच साल के ऑडिट की जांच ठंडे बस्ते में जाने के बाद विश्वविद्यालय ने आंतरिक स्तर पर 10 सदस्यों की टीम बनाकर पुराने पन्ने खोलना शुरु कर दिए हैं। विवि के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार हर स्तर पर जांच शुरु की गई है।

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तत्कालीन कुलसचिव डॉ. विश्वास त्रिपाठी की कई शिकायतें विवि को मिली है। अब तक कोई कार्रवाई नहीं होने के कारण विवि ने जांच के दायरे को बढ़ा दिया है। जल्द कुछ बड़े घोटाले सामने आएंगे। विवि के सूत्रों ने बताया कि केवल 5 करोड़ का फीस घोटाला ही नहीं हुआ बल्कि रखरखाव में खर्च होने वाले बजट में भी खेल किया गया है।

बता दें, अप्रैल 2025 में वित्तीय वर्ष 2024-25 के रिकॉर्ड के मिलान के दौरान पांच करोड़ रुपये से अधिक की फीस संबंधी कथित अनियमितता सामने आई थी। आरोप है कि छात्रों से प्राप्त फीस का भुगतान विश्वविद्यालय के सॉफ्टवेयर में दर्ज था, लेकिन संबंधित रकम आधिकारिक बैंक खातों में जमा नहीं मिली। मामले में फर्जी यूपीआई ट्रांजैक्शन आईडी और रसीदों के इस्तेमाल के आरोप भी लगाए गए हैं। इस मामले में 9 अप्रैल 2026 को तत्कालीन कुलसचिव डॉ. विश्वास त्रिपाठी समेत 12 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने की खबर सामने आई थी। सूत्रों का दावा है कि कथित अनियमितताओं का दायरा पांच करोड़ रुपये तक सीमित नहीं है। कई स्तर पर सरकारी पैसों को लूटा गया है। इसी आशंका के चलते पुराने वित्तीय रिकॉर्ड की जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जांच में फीस रजिस्टर, बैंक स्टेटमेंट, डिजिटल भुगतान रिकॉर्ड और वित्तीय दस्तावेजों का मिलान होने पर वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
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जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
अब जांच टीम के सामने यह पता लगाने की चुनौती होगी कि कथित वित्तीय अंतर किन परिस्थितियों में पैदा हुआ, संबंधित रिकॉर्ड में कहां विसंगति है और जिम्मेदारी किस स्तर पर बनती है। जांच के निष्कर्षों से विश्वविद्यालय की वित्तीय निगरानी व्यवस्था में संभावित खामियों की पहचान करने में भी मदद मिल सकती है। कुलसचिव प्रो चंदर कुमार सिंह ने बताया कि विवि ने टीम का गठन किया है। सरकारी पैसे का हिसाब देना होगा। कोई भी दोषी छोड़ा नहीं जाएगा। जल्द रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

वाटर कूलर की खरीद में लगे थे आरोप
पहले भी नियुक्ति से लेकर मेंटेंनेंस में हुए घोटाले को लेकर प्रोफेसरों ने मोर्चा खोला था। वाटर कूलर की खरीद में किए गए भ्रष्टाचार का मामला लखनऊ तक पहुंच गया था। हालांकि, जीबीयू में एक तरफा राज चलने के कारण कार्रवाई की आंच किसी पर नहीं आने दी गई। प्रो. विकास पंवार ने जिलाधिकारी के माध्यम से सीएम को भ्रष्टाचार को लेकर पत्र भी लिखा था, लेकिन उन्हें ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। उन्होंने तत्कालीन कुलपति आरके सिन्हा व कुलसचिव डॉ. विश्वास त्रिपाठी पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने बताया कि 2020 में ही छात्र बताते थे कि फीस जमा होने के बाद भी नहीं जमा होने की बात कही जाती है। बैलेंस शीट भी वेबसाइट पर नहीं डाली जाती थी।

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