जंग से उपजा जंगेश्वर मंदिर देता है मन को सुकून
पलवल। भवन कुंड के निकट स्थित शहर का प्राचीन और ऐतिहासिक जंगेश्वर मंदिर सालों से लोगों की आस्था का केंद्र रहा है। मंदिर में यूं तो रोज ही सुबह-शाम श्रद्घालुओं का तांता लगता है, लेकिन नवरात्र में इस मंदिर की छटा कुछ अलग ही होती है। नवरात्र के अलावा सोमवार, मंगलवार और शनिवार को यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां शहर के अलावा ग्रामीण क्षेत्र से भी भक्तजन पहुंचते हैं।
सन 1802 में दोबारा शुरू हुई मंदिर की स्थापना
सदियों पूर्व यहां शिव मंदिर था। किंवदंती के अनुसार, मुगलकाल में विधर्मियों ने इस मंदिर को तोड़ दिया था। अंग्रेजों के शासनकाल में वीर योद्घाओं ने यहां फिर से मंदिर स्थापित करने के लिए संघर्ष किया। इस पर दो संप्रदायों के बीच जबरदस्त जंग हुई। बताया जाता है कि तब इस स्थल की खुदाई करवाने का फैसला हुआ। खुदाई में दूध की धार निकली और फिर गंगाजल। इस पर दूसरे संप्रदाय के लोग मान गए कि यहां मंदिर ही हुआ करता था। इस तरह सन 1802 में यहां दोबारा मंदिर की स्थापना का काम शुरू हुआ। चूंकि मंदिर के लिए जंग लड़ी गई, इसलिए मंदिर का नाम जंगेश्वर मंदिर पड़ा। मंदिर में भगवान शिव के अलावा श्रीराम व माता सीता, शैरो वाली मां, राधा-कृष्ण, लक्ष्मी नारायण और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं।
मंदिर की खासियत : जंगेश्वर मंदिर की स्थापना कला अन्य मंदिरों की तरह ही है। इसके शुरुआती निर्माण में कखैया किस्म की ईंटों और चूने का प्रयोग किया गया, जबकि बाद में बड़ी ईंटों एवं सीमेंट का इस्तेमाल हुआ। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व की तरफ है, जबकि अन्य दो दरवाजे पश्चिम व दक्षिण दिशा की तरफ भी खुलते हैं। मंदिर में रोजाना सुबह पूजा अर्चना और आरती होती है। दिन में भी भजन-कीर्तन होते रहते हैं। नवरात्र में माता रानी की कथा व माता के जागरण होते रहते हैं। मंदिर के पुजारी राकेश ने बताया कि मंदिर ऐतिहासिक है और लोगों में इसकी बड़ी मान्यता है। वहीं मंदिर के महंत राम कुमार कहते हैं कि नवरात्र में सुबह-शाम भक्तों की भीड़ रहती है, इसलिए प्रतिदिन सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है। रविवार को रामनवमी को लेकर बाजारों में भीड़ जुटने लगी है। मंदिर में सजावट शुरू की जा रही है।