नोएडा में बढ़ता प्रदूषण और असंतुलित पर्यावरण दिल्ली एनसीआर की सबसे गंभीर समस्या है। जहरीली आबोहवा से शहर का दम घुट रहा है तो लोगों को भविष्य की चिंता सता रही है। वहीं, इस मुद्दे पर नेताओं की अनदेखी से आम जन में खासा रोष है। चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लिहाजा शहरवासी प्रदूषण का मुद्दा उठना चाहते हैं। हालांकि बढ़ते प्रदूषण पर लगाम कसने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सख्त कदम उठाए हैं।
नोएडा प्राधिकरण, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से लेकर जिला प्रशासन तक को निर्देश दिये गए। निर्देशों पर अमल करते हुए करोड़ों रुपये के चालान, लोगों को पॉलिथीन के प्रति जागरूक करने के साथ अभियान चलाकर स्कूली बच्चों ने नुक्कड़ नाटक किये और सामाजिक संगठन सड़कों पर उतरे। इतना ही नहीं जहरीली हवा से बचने के लिए मास्क का भी वितरण किया गया। लेकिन इसके बाद भी कोई फर्क नहीं पड़ा है।
स्वच्छ पर्यावरण जीवन के लिए जरूरी है। देशभर के मतदाताओं को कम से कम एक पेड़ लगाने की शपथ लेनी चाहिए। राजनीतिक दलों को भी इस ओर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। पर्यावरण बचाव के लिए मिलजुल कर काम करने की आवश्यकता है।- विजयपाल बघेल, ग्रीनमैन
देश इतना प्रदूषित हो गया है कि कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। कोई भी राजनीतिक पार्टी इस पर काम नहीं कर रही है। जगह-जगह एनजीटी के नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। खाली प्लॉटों पर कूड़े के ढेर लगे हुए हैं।- डॉ. आनंद आर्या, पर्यावरणविद
देश की आबोहवा को सुधारने के लिए सरकार का ध्यान स्वच्छता अभियान पर है। लेकिन स्मार्ट सिटी नोएडा की आबोहवा जहरीली होती जा रही है। कलपुर्जों की यह नगरी प्रदूषण के मामले में पहले पायदान पर भी आ चुकी है। नेता वादे तो करते हैं लेकिन चुनाव जीतने के बाद काम नहीं करते।- एनपी सिंह, फोनरवा अध्यक्ष
प्रदूषण से निपटने के लिए सरकारी तंत्र के पास कोई एक्शन प्लान नहीं है। हवा में पीएम 2.5 की मात्रा खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है। प्रदूषण का स्तर अस्पताल में मरीजों की संख्या बढ़ाने का काम कर रहा है। इसके लिए प्रत्याशियों को आगे आना होगा। तभी इस पर रोक लगाई जा सकती है।- विक्रांत तोंगड़, पर्यावरणविद