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Noida News: खुद डॉक्टर करा रहे 30 फीसदी एंटीबायोटिक का गैर जरूरी उपयोग

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खुद डॉक्टर करा रहे 30 फीसदी एंटीबायोटिक का गैर जरूरी उपयोग
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- खुद से दवा लेने का चलन भी बना एंटीबायोटिक दवाओं से नुकसान की वजह
- सेफेक्सीम, एजिथ्रोमाइसिन जैसी दवाओं की प्रतिरोधकता बन रही खतरा
- कोरोना के समय अंधाधुंध उपयोग हुईं एंटीबायोटिक, एंटीमाइक्रोबियल दवाओं का खतरा अब आ रहा सामने

फोटो

माई सिटी रिपोर्टर
नोएडा। एंटीबायोटिक दवाओं का अंधाधुंध उपयोग करने के लिए मरीजों के संग खुद डॉक्टर भी जिम्मेदार हैं। एंटीबायोटिक दवाओं के सेवन के लिए गैर जरूरी रूप से खुद डॉक्टर ही सलाह दे रहे हैं। वायरल संक्रमण तक में पहले ही दिन से जल्दी फायदा पहुंचाने के नाम पर एंटी बायोटिक दवाओं का उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है। इसका असर यह है कि सेफेक्सीम, एजिथ्रोमाइसिन जैसी महत्वपूर्ण दवाओं तक की प्रतिरोधकता मरीजों में पैदा हो रही है। खासतौर पर छोटे बच्चों तक में इस प्रतिरोधकता बन जाने की वजह से उनको इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती तक करना पड़ रहा है।
मंगलवार को पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ, नोएडा (चाइल्ड पीजीआई) में माइक्रोबायलॉजी विभाग की ओर से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस विषय पर आयोजित मेडिकल सेमिनार में मौजूद विशेषज्ञों ने एंटीबायोटिक्स के गलत उपयोग की जानकारी दी। प्रो. संगीता शर्मा, प्रेसिडेंट दिल्ली सोसाइटी फॉर प्रमोशन ऑफ रेशनल यूज ऑफ ड्रग्स और विभागाध्यक्ष न्यूरोसाइकोफार्माकोलॉजी, इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमेन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेस दिल्ली का कहना है कि एंटीबायोटिक का अंधाधुंध उपयोग खतरनाक हालात पैदा कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, इंडियन काउंसिल फाॅर मेडिकल रिसर्च तक की रिपोर्ट में इस खतरे के लिए आगाह किया जा चुका है। हालात यह हैं कि 80 फीसदी तक एंटीबायोटिक का उपयोग बिना आवश्यकता के हो रहे हैं। इसमें डॉक्टरों की सलाह के अलावा खुद मेडिकल स्टोर से बिना चिकित्सकीय सलाह के धड़ल्ले से हो रही बिक्री भी शामिल हैं।
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चाइल्ड पीजीआई के माइक्रोबायलॉजी विभाग में प्रोफेसर डॉ. एनपी सिंह ने बताया कि एक आकलन के मुताबिक खुद डॉक्टर ही 30 फीसदी तक गैर जरूरी सेवन मरीजों को करा रहे हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि कई बार एंटीबायोटिक के लिए प्रतिरोधकता मरीज के लिए जानलेवा तक हो जाती है। इस प्रवृत्ति को सुधारने की जरूरत है। जो संक्रमण पहले जिन सामान्य एंटीबायोटिक से ठीक हो जाते थे, वह अब टैबलेट के रूप में प्रभावी नहीं रही हैं। कई बार तो मरीज को आईसीयू में रखकर इंट्रावीनस तरीके से दवा देनी होती है।
इनसेट-
पूरा पर्यावरण ही खतरनाक हो रहा
चाइल्ड पीजीआई की माइक्रोबायलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. सुमी नंदवानी ने बताया, एंटीबायोटिक का गैर जरूरी सेवन जहां खतरा बन गया है वहीं, इस खतरे को बढ़ाने का काम मछली और मुर्गी पालन में अधिक उत्पादन के लालच ने भी किया है। यहां भी एंटीबायेाटिक के उपयोग से कम समय में अधिक मांस उत्पादन किया जा रहा है। इसके भी नुकसान आम लोगों को झेलने होते हैं। टीबी तक के मरीजों में अब दवाओं के लिए प्रतिरोधकता देखने को मिल रही है। कोरोना के समय लोगों ने बिना जरूरत के अंधाधुंध एंटीबायोटिक दवाएं लीं। इसके भी परिणाम अब सामने आने लगे हैं। लोगों और डॉक्टरों को समझना होगा कि बिना एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग के भी संक्रमण को ठीक किया जा सकता है। इन दवाओं को सर्जरी, गंभीर संक्रमण के लिए उपयोगी बने रहने की जरूरत है।

एक खतरा यह भी, नई दवाएं ही नहीं आएंगीं
प्रो. संगीता शर्मा का कहना है कि केवल प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाना ही खतरा नहीं है। एक नया खतरा नई एंटीबायोटिक दवाओं पर शोध नहीं होने के रूप में भी सामने आ रहा है। इसकी वजह यह है कि जब भी नई एंटीबायोटिक फार्मा कंपनियां विकसित कराती हैं, उसके लिए प्रतिरोधकता वायरस पैदा कर ले रहा है। ऐसे में कंपनियाें ने भी एंटीबायोटिक दवाओं के क्षेत्र में अब शोध से हाथ खींच लिए हैं। इसके परिणाम यह होंगे कि आने वाले समय में नई एंटीबायोटिक ही नहीं आएगी और पुरानी उपयोगी नहीं रहेंगीं। ऐसे में गंभीर रूप से संक्रमण को रोका नहीं जा सकेगा। यह बहुत खतरनाक स्थिति होगी।
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अच्छा डॉक्टर वही जो कम दवा में ठीक करे
प्रो. एके सिंह, प्लास्टिक सर्जन व चाइल्ड पीजीआई के निदेशक का कहना है कि 1981 में ही यह मुझे सिखाया गया कि एंटीबायोटिक का उपयोग रूटीन इलाज में नहीं करना है। यही हमेशा अपने छात्रों को भी केजीएमयू में शैक्षिक कार्यकाल में सिखाने की कोशिश की। मेरा मानना है कि ज्यादा फीस लेकर दो-तीन एंटीबायोटिक संग आठ-दस दवाएं सेवन करने के लिए मरीज को देने वाले अच्छे डॉक्टर नहीं हैं। अच्छे डॉक्टर वह हैं जो न्यूनतम दवाएं और बिना एंटीबायोटिक के मरीज को ठीक करें। निदेशक ने सभी जूनियर डॉक्टर और फैकल्टी को उचित रूप से ही एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग के लिए शपथ भी दिलाई। कार्यक्रम में सुबह के समय एक वॉकाथन का भी आयोजन जागरूक करने के लिए किया गया। इस दौरान सीएमएस डॉ. मुकुल जैन, डीन डॉ. डीके सिंह मौजूद रहे। एंटीबायोटिक के खतरे के लिए जागरूक करते हुए एक नुक्कड़ नाटक भी जूनियर डॉक्टर्स ने किया।

इन दवाओं के लिए मिल रह प्रतिरोधकता
- जेंटामाइसिन
- सेफेक्सीम
- एजिथ्रोमाइसिन
- सेफलॉसपोरिन
- डॉक्सीसाइक्लिक
- नॉरफ्लोक्सिसिन
- एमोक्सिलिन
(जैसा कि विशेषज्ञों ने बताया)
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