खाद्य संकट-गरीबी की तरफ ढकेल सकती है तापमान बढ़ोतरी : सीएसई
कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में कटौती कर बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रखना होगा
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। देश में बीती एक सदी में हुई तापमान बढ़ोतरी का असर साफ दिखने लगा है। 1901 से अब तक जनवरी और फरवरी के महीने में दो डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोतरी हुई है। वहीं, मानसून को छोड़कर अन्य सीजन में तापमान में करीब एक डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
वैज्ञानिकों का अंदाजा है कि 2050 तक वैश्विक स्तर पर तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक की बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसे में यदि कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में कटौती कर इस बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर नहीं रखा गया, तो ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में भीषण खाद्य संकट और गरीबी आ सकती है। अंतर सरकारी पैनल (आईआईपीसी) की हालिया रिपोर्ट को लेकर सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने शुक्रवार को यह बात कही।
तापमान बढ़ोतरी को न करें नजरअंदाज
सीएसई की महानिदेशक व पर्यावरणविद सुनीता नारायण ने कहा कि हाल ही में आईआईपीसी की ओर से 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ोतरी को लेकर जारी रिपोर्ट में जिस विनाश और दुष्परिणाम की संभावनाओं का जिक्र किया गया है, उसे बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। अब यह सोचने का वक्त नहीं रहा कि कौन सा देश वातावरण में ज्यादा कार्बन डाई ऑक्साइड रूपी जहर घोल रहा है। भारत को पेरिस समझौते के तहत 2 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ोतरी को कम रखने वाले उपायों की बजाय अब 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ोतरी के लक्ष्य को लेकर गंभीर होना चाहिए। भारत के पास मौका है कि वह इसकी अगुवाई करे और दुनिया के अन्य देशों को पेरिस समझौते के तहत 2 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ोतरी रोकने के सामूहिक लक्ष्य को बदलवाकर 1.5 डिग्री सेल्सियस करवाए।
71 करोड़ लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ेगा
पर्यावरणविद सुनीता नारायण ने बताया कि आईआईपीसी की रिपोर्ट साफ तौर पर यह बताती है कि वैश्विक स्तर पर 2 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ोतरी को रोकने का लक्ष्य सिर्फ अमीरों के लिए है, जबकि 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ोतरी को रोकने का लक्ष्य गरीबों के हित को लेकर होगा। आईआईपीसी की रिपोर्ट में भारत के तटीय क्षेत्रों में समुद्र तल की ऊंचाई एक मीटर तक बढ़ने का अनुमान वैज्ञानिकों ने लगाया है। ऐसे में 71 करोड़ लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ेगा। इतना ही नहीं बाढ़ और सूखे की समस्या से कृषि क्षेत्र को बड़ी चोट लग सकती है। अनुमान के मुताबिक, 2030 तक गेहूं और चावल के उत्पादन में 6 फीसदी तक कमी आ सकती है। इससे खाद्य सुरक्षा का संकट भी झेलना पड़ सकता है।
यह करने होंगे उपाय
-तापमान बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रखने के लिए 2030 तक मानव जनिक सीओटू उत्सर्जन में 45 फीसदी की कटौती करनी होगी। 2050 में इस उत्सर्जन को शून्य करना होगा।
-2050 तक दुनिया में बिजली की खपत में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 70 से 85 फीसदी तक करनी पड़ेगी। यह इस वक्त 20 फीसदी है।
-2050 तक कोयले की खपत को बिल्कुल खत्म करना होगा। जीवाश्म ईंधन को खत्म करने के लिए दुनिया के सभी देशों को प्रयास करना होगा।
-2025 तक ऊर्जा क्षेत्र में अतिरिक्त 2.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का सालाना निवेश करना होगा। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था का ढाई फीसदी है।
-कार्बन को सोखकर धरती में भंडारण जैसी नई तकनीकी कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (सीसीएस) का प्रयोग। वानिकी, जैविक कचरे का इस्तेमाल आदि काम भी करने होंगे।