मुकदमें के प्रति खुद भी रहना होगा चौकन्ना : कोर्ट
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि आपने किसी के खिलाफ या किसी ने आपके खिलाफ मुकदमा दाखिल किया है तो अदालत में चल रही सुनवाई के प्रति आपको खुद भी चौकन्ना रहना होगा, वरना नुकसान उठाना पड़ सकता है। अदालत ने यह टिप्पणी दीवानी मामले में अपील दाखिल करने में हुई देरी के लिए अपने वकील को जिम्मेदार ठहराने संबंधी निजी कंपनी के तर्क को खारिज करते हुए की।
न्यायमूर्ति विनोद गोयल ने कहा है कि वादी और प्रतिवादी को अपने मुकदमें के प्रति चौकन्ना रहना होगा। उन्होंने कहा कि वादी-प्रतिवादी मुकदमें की सुनवाई में होने वाली किसी त्रुटी, देरी, आदेश या फैसले के बारे में जानकारी नहीं मिलने के बारे में अपने वकील पर ही सारी जिम्मेदारी नहीं थोप सकते। उन्होंने कहा कि वादी-प्रतिवादी को मुकदमें में किसी तरह की खामी के लिए सारे आरोप वकीलों पर थोपने की इजाजत नहीं दी जा सकती है।
इसके साथ ही, अदालत ने दीवानी मामले में निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दाखिल करने में हुई 400 दिन की देरी को माफ करने के आग्रह को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति विनोद गोयल ने कहा है कि ऐसा लगता है कि अपील दाखिल करने में हुई देरी की माफी पाने के लिए कंपनी ने सारी जिम्मेदारी अपने वकील के ऊपर थोप दी है।
ऐसे लोगों से अदालतों पर बढ़ता है बोझ
अदालत ने कहा कि मुकदमा और जवाब दाखिल करने के बाद वादी-प्रतिवादी को घर में जाकर सोने और आदेश पारित होने के काफी समय बाद इसकी खोज खबर लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के वादी-प्रतिवादियों की वजह से अदालतों में मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है। गौरतलब है कि पैसे की वापसी पाने के लिए दाखिल दीवानी मामले में निचली अदालत के फैसले के खिलाफ एक कंपनी ने 400 दिन की देरी से अपील दाखिल की। कंपनी ने तर्क रखा कि उनके वकील ने नवंबर 2014 से मामले में पेश होना बंद कर दिया, लेकिन भरोसा दिया कि फैसला उनके ही हक में होगा। याची ने यह भी कहा कि फैसला आने पर वकील ने उन्हें इस बारे में कोई जानकारी भी नहीं दी।