दोषियों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध का मामला
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चुनाव आयोग की चुप्पी पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार
क्रासर---
- कोर्ट ने कहा, आप हां या नहीं में उत्तर दीजिए, चुप्पी साधे रखना विकल्प नहीं
- आयोग अगर स्वतंत्र निकाय तो उसका नजरिया स्वतंत्र क्यों नहीं होना चाहिए
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। आपराधिक मामले में दोषियों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध केमामले में स्पष्ट रुख जाहिर न करने पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयोग को जमकर फटकार लगाई। इस मसले पर चुनाव आयोग के ठंडे रवैये पर शीर्ष अदालत ने कहा कि चुप्पी साधे रखना विकल्प नहीं है। मालूम हो कि वर्तमान प्रावधान के मुताबिक किसी सजायाफ्ता व्यक्ति के छह वर्ष तक ही चुनाव लड़ने पर पाबंदी है। इस मामले में अगली सुनवाई 19 जुलाई को होगी।
शीर्ष अदालत ने आयोग से कहा, ‘अगर वह स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण है तो अपना स्वतंत्र नजरिया क्यों नहीं रख सकता। क्या वह अपना पक्ष रखने के लिए विधायिका के निर्देश पर निर्भर है। अगर कोई नौकरशाह दोषी ठहराया जाता है तो वह आजीवन नौकरी से बर्खास्त हो जाता है, लेकिन राजनेताओं पर छह वर्ष की ही पाबंदी क्यों? क्यों नहीं उन पर भी आजीवन पाबंदी होनी चाहिए?।’
न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि चुनाव आयोग इस मसले पर अपना रुख स्पष्ट करने से बच रहा है। आयोग की ओर से पेश वकील ने कहा कि आयोग राजनीति को अपराध मुक्त बनाने के पक्ष में है। हालांकि आयोग ने यह साफ नहीं किया कि वह दोषी राजनेताओं के आजीवन चुनाव लड़ने पर पाबंदी के पक्ष में है या नहीं। पीठ ने आयोग से कहा, ‘आपने हलफनामे में कहा है कि आप इस जनहित याचिका के समर्थन में हैं, लेकिन सुनवाई के दौरान आप कह रहे है कि आपने सिर्फ राजनीति को अपराधियों से मुक्त करने का समर्थन किया है। हम इसका क्या मतलब समझे। हमें पता है कि आपने चुनाव सुधार को लेकर अपनी सिफारिशें केंद्र सरकार को भेजी है लेकिन इस खास मसले पर आपकी राय क्या है।’ मालूम हो कि इस मामले में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा था कि वह इस जनहित याचिका के समर्थन में हैं।
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माननीयों की एक बानगी
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर) के अनुसार उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में इस साल हुए विधानसभा चुनावों में चुनकर आए 690 विधायकों में से 192 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। 690 में 140 यानी लगभग 20 फीसदी माननीयों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले हैं जिनमें पांच साल या उससे ज्यादा की सजा हो सकती है।
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केंद्र कर रहा विरोध
- दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने अपराधियों के चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है।
- अपनी याचिका में उपाध्याय ने नेताओं के खिलाफ मामलों को एक साल के भीतर निपटाने की व्यवस्था किए जाने का भी आग्रह किया है।
- याचिका में चुनाव लड़ने के लिए अधिकतम उम्र और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता तय करने का भी अनुरोध किया गया है।
- केंद्र सरकार इस याचिका का विरोध कर रही है। उसकी दलील है कि अपराधियों के चुनाव लड़ने पर रोक के प्रावधान का दुरुपयोग हो सकता है। सरकार ने संसद की स्थायी समिति की सिफारिश का भी हवाला दिया जिसमें चुनाव आयोग और विधि आयोग के इस सुझाव को खारिज कर दिया गया था।
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पहले भी उठा था मामला
- सुप्रीम कोर्ट में यह मामला 2011 में एक जनहित याचिका के जरिये भी उठाया गया था, जिसे विचार के लिए विधि आयोग को सौंप दिया गया
- विधि आयोग की रिपोर्ट में कहा गया कि सजायाफ्ता व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर रोक का उपाय बहुत कारगर साबित नहीं होगा क्योंकि दोष सिद्ध करने की प्रक्रिया बहुत लंबी है
- इसके मद्देनजर आयोग ने कहा था कि किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध में आरोप तय होने के साथ ही उस पर चुनाव लड़ने की पाबंदी लागू कर देनी चाहिए
- सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई, 2013 को अपने फैसले में दो साल की सजा पाए व्यक्ति पर किसी विधायी निकाय का चुनाव लड़ने पर छह साल की रोक लगाई
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