फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ग्रामीणों का कैसे हो घर बैठे समस्या का निदान, योजना नहीं चढ़ी सिरे

विज्ञापन
विज्ञापन
ग्राम सचिवालय वीरान, कैसे हो समाधान
विज्ञापन

- ग्रामीणों को घर बैठे समस्या का नहीं मिल रहा निदान, योजना पर फिरा पानी
- करोड़ों की लागत से बनाए गए थे 41 ग्राम सचिवालय
अमर उजाला ब्यूरो
नूंह। जिला लघु सचिवालय की तर्ज पर ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान के लिए गांवों में बनाए गए ग्राम सचिवालय आज वीरान पड़े हैं। यहां न तो कोई अधिकारी व कर्मचारी आकर लोगों की समस्याएं सुनता है और न ही यहां ग्राम पंचायत की बैठक होती है। लिहाजा जिले में करोड़ों की लागत से बनाए गए ये ग्राम सचिवालय महज कागजों तक सीमित रह गए हैं। जबकि उम्मीद की जा रही थी कि सरकार की यह योजना सिरे चढ़ी तो निश्चित तौर पर ग्रामीणों को रोजमर्रा की समस्याओं से काफी हद तक घर बैठे निजात मिलेगी।
भाजपा सरकार ने पदभार संभालते ही जिले के करीब 41 गांवों में ग्राम सचिवालय बनवाए। कुछेक के लिए नई बिल्डिंग बनवाई गई तो कुछ पुरानी बिल्डिंग में रंगरोगन कराकर शुरू कर दिए गए। उस समय संतरी से लेकर मंत्री तक यह प्रचार किया गया था कि इन ग्राम सचिवालयों में ग्राम पंचायत के सभी कार्यों के साथ-साथ संबंधित पटवारी, ग्राम सचिव, बिजली बोर्ड, कृषि विभाग, जनस्वास्थ्य विभाग सहित कई अन्य विभागों के अधिकारी व कर्मचारी आकर ग्रामीणों की समस्याएं सुनेंगे और उनका निदान कराएंगे। इनके बनने के बाद लोगों को जिला मुख्यालय या फिर संबंधित विभाग के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। उन्हें घर बैठे बेहतर प्रशासनिक समाधान मिलेगा। इसके अलावा और भी कई प्रकार की बातें की गई थीं। लेकिन ये दावे महज कागजी साबित हुए और ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जिले में बनाए गए सभी ग्राम सचिवालय अब वीरान पड़े हैं। इनमें कोई अधिकारी व कर्मचारी नहीं जाता। ऐसे में यह सचिवालय धीरे-धीरे खंडहर में भी तब्दील होने लगे हैं। जिला प्रशासन का इस ओर कोई ध्यान नहीं है।
विज्ञापन

क्या कहते हैं ग्रामीण
आलदोका निवासी सुखीराम देशवाल, इंडरी निवासी जगदेव एडवोकेट, देशराज पंवार, टांई निवासी अब्दुल हई, रानीका निवासी नजीर अहमद का कहना है कि जिस मकसद से इन्हें बनाया गया था वो बेहतर था। ग्रामीणों को घर बैठे प्रशासनिक सुविधाएं मिलती और समस्याओं का समाधान भी होता। लेकिन इस योजना पर अमल तो किया ही नहीं गया। सरकार केवल कागजों में योजना बनाने तक सीमित है। गांवों में सबसे ज्यादा बिजली-पानी, सड़क आदि की समस्याएं रहती हैं। इनको मौके पर सुनाकर ठीक किया जाता तो इससे बेहतर कुछ नहीं होता। लोगों को अब भी अपनी समस्याओं के निदान के लिए जिला व उपमंडल स्तर के कार्यालयों में जाकर गुहार लगानी पड़ती है। इससे पैसा व समय दोनों की हानि होती है। सरकार अपनी इस योजना पर अमल करे।
विज्ञापन


ग्राम सचिवालय बनाए गए हैं, इनमें सरपंचों को बैठकर काम करना चाहिए। अन्य विभागों के अधिकारियों व कर्मचारियों, जिनकी ड्यूटी वहां लगाई गई थी उन्हें जाना चाहिए। यह एक अच्छी योजना है, लेकिन हर विभाग में स्टाफ की कमी से कहीं न कहीं यह योजना प्रभावित हो रही है। - राकेश मोर, डीडीपीओ

फोटो- वीरान पड़ा आलदोका गांव का ग्राम सचिवालय।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें