मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने सोमवार को इग्नू के 33वें दीक्षांत समारोह में कहा कि हिंदी स्वाधीनता आंदोलन रूपी रथ की सारथी थी। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि जिन महापुरुषों ने स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में हिंदी को राष्ट्रभाषा कहा और माना था, उनमें से अधिकतर की मातृभाषा हिंदी नहीं थी।
उन्होंने देश के लिए हिंदी को राष्ट्रभाषा माना था। हिंदी का विकास स्वाधीनता आंदोलन के साथ हुआ था। इस प्रकार यह वंचना के विरुद्ध संघर्ष व स्वाधीनता की भाषा है। संस्कृत से प्राचीन व वैज्ञानिक भाषा कोई दूसरी नहीं है।
पाणिनी के व्याकरण पर पूरा पश्चिम मोहित है और हम भूले हुए हैं। वाल्मीकि और कालिदास का समतुल्य कोई दूसरा सर्जक पूरी दुनिया में नहीं है। बौद्ध दर्शन के शून्यवाद पर पश्चिम का उत्तरआधुनिकता का सिद्धांत टिका है। उन्होंने वहीं से प्रेरणा ग्रहण की है। इसलिए हमें हिंदी और संस्कृत का महत्व समझना ही होगा।
दिल्ली स्थित इग्नू मुख्यालय में आयोजित दीक्षांत समारोह में इससे पहले मानव संसाधन विकास मंत्री ने मुख्यालय समेत 56 रिजनल सेंटर में दो लाख से अधिक छात्रों को यूजी, पीजी व पीएचडी डिग्री, डिप्लोमा व सर्टिफिकेट देकर सम्मानित किया। निशंक ने पचास उत्कृष्ठ प्रदर्शन करने वाले छात्रों को गोल्ड मेडल भी दिए।
इससे पहले कुलपति प्रो. नागेश्वर राव ने विश्वविद्यालय की योजनाओं की जानकारी दी। इसमें ऑनलाइन डिग्री प्रोग्राम की पढ़ाई शुरू करना था। उन्होंने कहा कि कोर्स व पाठ्यक्रम ऐसे ढंग से तैयार किए जा रहे हैं, जिसमें डिग्री संग कौशल विकास हो। इसका मकसद युवाओं को पढ़ाइ्र के साथ रोजगार से जोडऩा है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय ने २०३० तक ग्रास इनरोलमेंट रेशों 50 फीसदी तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है।
माता-पिता व शिक्षकों के चलते डिग्री पाने का सौभाग्य
निशंक ने डिग्री पाने वाले छात्रों से कहा कि माता-पिता व शिक्षकों के चलते उन्हें यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इसलिए जीवन में सफलता के पीछे इनकी तपस्या को कभी न भूलेें। माता-पिता से बड़ा गुरु कोई नहीं हो सकता और जीवन के हर पल सीखना जारी रहता है। केंद्रीय मंत्री ने इग्नू प्रशासन से कहा कि वे संस्कृत भाषा में प्राचीन कोर्स तैयार करने के साथ-साथ ज्योतिष शास्त्र में भी प्राचीन संग आधुनिक कोर्स तैयार करें।