लू को बताया गंभीर पर्यावरणीय आपदा, 19 अगस्त तक जवाब दाखिल करने के निर्देश
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। देश में लगातार बढ़ रही भीषण गर्मी और लू की घटनाओं पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार, कई राज्यों और संबंधित एजेंसियों से विस्तृत कार्ययोजना मांगी है। एनजीटी की प्रधान पीठ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद ने कहा कि लू देश की सबसे कम पहचानी जाने वाली, लेकिन तेजी से गंभीर होती पर्यावरणीय आपदाओं में से एक है।
पीठ ने कहा कि बढ़ता तापमान जनस्वास्थ्य, कृषि, जल संसाधनों, वन्यजीवों, श्रम उत्पादकता और अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर डाल रहा है। मामले में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) तथा उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों को पक्षकार बनाया गया है। सभी संबंधित विभागों और राज्य सरकारों को शपथपत्र के माध्यम से अपना जवाब और कार्ययोजना प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी।
एनजीटी ने 22 मई को प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर यह कार्रवाई की। अधिकरण ने भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश के बांदा में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा, जबकि दिल्ली समेत कई राज्यों में भीषण लू का प्रकोप देखने को मिला है। पीठ के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में कंक्रीट की संरचनाओं का विस्तार, हरित क्षेत्रों में कमी, वाहन प्रदूषण, औद्योगिक गतिविधियां और ऊर्जा की बढ़ती खपत तापमान वृद्धि के प्रमुख कारण हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में लंबे समय तक काम करने की मजबूरी, शीतलन सुविधाओं की कमी और सीमित संस्थागत सहायता लोगों की संवेदनशीलता बढ़ा रही है।
समुदाय आधारित निगरानी तंत्र और व्यापक शोध की आवश्यकता
एनजीटी ने क्षेत्रवार जलवायु अनुकूलन रणनीति, तापमान मैपिंग, रिमोट सेंसिंग तकनीक, बेहतर मौसम पूर्वानुमान प्रणाली, ओपन-एक्सेस जलवायु डेटा, स्कूल एवं समुदाय आधारित निगरानी तंत्र तथा हीट रिस्क पर व्यापक शोध की आवश्यकता पर बल दिया। अधिकरण ने स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों से बढ़ता तापमान पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है।