वेतन न मिलने के कारण पूर्वी दिल्ली में चल रहे सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि कर्मचारियों को समय से वेतन देना प्राधिकरणों का संवैधानिक दायित्व है।
वेतन के लिए आवंटित पैसा किसी दूसरे काम के लिए बिल्कुल भी नहीं छुआ जाना चाहिए। वहीं पीठ ने प्राधिकरणों को फटकार लगाते हुए उन्हें शुक्रवार को दिल्ली में सफाई कर्मचारियों के वेतन के लिए आवंटित बजट का ब्यौरा और दस्तावेज भी पेश करने का निर्देश दिया है।
जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने बृहस्पतिवार को इस मामले पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान पीठ ने सभी निगमों, दिल्ली विकास प्राधिकरण, दिल्ली सरकार, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय की दलीलें सुनी। वहीं अपनी टिप्पणी में कहा कि निगम और सरकार के बीच टकराव का खामियाजा लोगों को उठाना पड़ रहा है।
पीठ ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण कमेटी (डीपीसीसी), केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण कमेटी (सीपीसीबी) को अब तक कूड़ा-कचरा संग्रहण, छंटाई और निपटारे को लेकर जारी की गई अधिसूचना का ब्यौरा पेश करने को कहा है। जबकि पीठ ने निगमों को पूछा है कि उनके यहां कूड़ा-कचरा उठाने वाले कितने ट्रक हैं और कितने ट्रक में जीपीएस प्रणाली संचालित है।
वहीं वेतन के लिए पूर्वी दिल्ली नगर निगम विकास ने बताया कि उनके अधीन करीब 15 हजार सफाई कर्मचारी हैं और 2016-17 में अब तक 605 करोड़ रुपये सैलरी के लिए आवंटित किए जा चुके हैं। इस पर पीठ ने कहा कि शुक्रवार को संबंधित अधिकारी ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश हों और अधिकारिक दस्तावेज ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश करें।
पीठ ने दिल्ली सरकार को उच्च न्यायालय के जरिए कूड़ा-कचरा हटाने और साफ करने संबंधी दिए गए आदेश की प्रति भी ट्रिब्यूनल में दाखिल करने को कहा है। एनजीटी ने सुनवाई के दौरान केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय को भी फटकार लगाते हुए कहा कि राष्ट्रीय राजधानी को स्वच्छ बनाने में आपकी क्या भूमिका है।
दिल्ली सरकार से भी पीठ ने पूछा है कि वह बताएं कि मौजूदा समय कूड़े-कचरे की समस्या से निपटने के लिए उनके पास क्या योजना है? मामले की सुनवाई शुक्रवार को होगी। इसके बाद एनजीटी विस्तृत आदेश जारी कर सकता है।