मेरा सपना था दुनिया की सबसे ऊंची चोटी को फतह करना, लेकिन नेपाल में आई भूकंप ने मेरे बढ़ते कदम को रोक दिया। कदम रुककर भले वापस आ गए हों, पर अभी हौसले पस्त नहीं हुए हैं।
अगले साल फिर हिमालय फतह करने निकलूंगा। यह कहना है नेपाल में भूकंप के बाद बुधवार रात गुड़गांव लौटे पर्वतारोही नरेंद्र का। नरेंद्र में अब भी एवरेस्ट फतह का जज्बा के साथ खौफनाक मंजर आंखों के सामने है।
नरेंद्र कहते है 25 अप्रैल को जब भूकंप आया, वह बेस कैंप के टेंट में रुके हुए थे। देखते ही देखते हिमस्खलन में उनका पूरा बेस कैंप तबाह कर दिया। 16-20 पर्वतारोहियों सहित 30 से अधिक लोगों की मौत हो गई।
लाशों और घायलों के बीच गुजारी रात
60 से अधिक घायल होंगे। हमलोग थोड़े से दूरी पर थे, तो बच गए, लेकिन नीचे उतरने का कोई साधन नहीं था। लाशों और घायलों के साथ ही रात गुजारी। कई साथी बर्फ में दब गए।
बकौल नरेंद्र, 12 सदस्यों वाले इंटरनेशनल टीम में अकेले भारतीय थे। ट्रेनिंग के दौरान बताई गई तकनीक काम आई। हालत खराब हो रहे थे। रह-रहकर पहाड़ कांप रहा था।
बचाव अभियान की शुरुआत से पहले सभी सदस्यों ने उतरने का फैसला लिया। सारे रास्ते बंद हो चुके थे। पीने का पानी तक नहीं था। पैदल ही नीचे उतरने का फैसला किया।
सात दिनों तक जिंदा रहने का जतन
सात दिनों में जिंदा रहने के लिए जितना जतन किया, भगवान दुश्मन को भी ऐसा दिन नहीं दिखाए। बीच में आने वाले गांवों में गए और जिंदा रहने के लिए मांग-मांग कर पेट भरा।
उनके पास भी कुछ नहीं था। लोगों ने बहुत मदद की। वहां से वायु सेना के हेलीकॉप्टर से काठमांडू पहुंचे। फिर वहां से हेलीकॉप्टर के जरिए बुधवार रात चंडीगढ़ और बृहस्पतिवार सुबह गुड़गांव पहुंचे।