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नोएडा: प्राधिकरणों और बैंकों की लापरवाही 70 फीसदी प्रोजेक्टों पर पड़ सकती है भारी

Sat, 27 Jul 2019 04:18 AM IST
देव कश्यप सुशील पांडेय, अमर उजाला, नोएडा
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सांकेतिक चित्र
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प्राधिकरणों व बैंकों की लापरवाही 70 प्रतिशत प्रोजेक्टों के खरीदारों पर भारी पड़ सकती है। जिस तरह का फर्जीवाड़ा आम्रपाली ने अपने खरीदारों के साथ किया, उससे संभव है कि कुछ इसी तरह की संभावना उन 70 प्रतिशत से ज्यादा प्रोजेक्टों में भी मिले, जिनका काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है। लिहाजा खरीदारों के हित में समय रहते कार्रवाई करनी होगी। आम्रपाली मामले में सुप्रीम कोर्ट के अवलोकन में कुछ इसी तरह के संकेत मिल रहे हैं।

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कोर्ट ने आम्रपाली मामले में फैसला सुनाते हुए प्राधिकरणों को कई बिंदुओं पर घेरा और लापरवाही करने पर सवाल उठाए। यही नहीं कोर्ट ने बैंकों को भी सवालों के घेरे में रखा। आम्रपाली समूह को सहयोग करने की बात भी कही। इसमें कोर्ट ने कई बिंदुओं पर सवाल उठाए।

डिफॉल्टर होने के बावजूद आम्रपाली को मिला सहयोग
फोरेंसिक ऑडिट में साफ किया गया है कि आम्रपाली के लीज रेंट नहीं चुकाने के बावजूद प्राधिकरणों ने समूह को प्लॉट देना जारी रखा। पहली लीज एक मई 2007 को हुई। इसके बाद आखिरी 30 जुलाई 2010 को हुई। इस बीच में आम्रपाली ने बकाया नहीं चुकाया। यही नहीं डिफॉल्टर होने के बावजूद प्राधिकरणों ने आम्रपाली समूह को मॉर्टगेज परमिशन और एनओसी देनी जारी रखी, जोकि 24 दिसंबर 2009 से 27 फरवरी 2013 तक दी गई। इस दौरान प्रीमियम और एडवांस वार्षिक लीज रेंट को समय से नहीं चुकाने की बात छिपी नहीं थी, लेकिन प्राधिकरणों ने नियमों को ताक पर रखकर काम किया।

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सबलीज डीड पर भी उठे सवाल

आम्रपाली समूह ने सेंचुरियन पार्क और ड्रीम वैली प्रोजेक्ट के लिए आवंटित जमीनों को कुछ अन्य डेवलपर्स को बेचा। इससे उसे 66 करोड़ रुपये की आय हुई। यहां यह सवाल उठाया गया कि बिना बकाया चुकाए सबलीज डीड कैसे संभव हो पाई। इस मामले में प्राधिकरणों पर भी सवाल उठाए गए हैं। यही नहीं जिन डेवलपर्स को प्लॉट बेचे, उनके साथ भी आम्रपाली के संबंध पाए गए।

प्राधिकरणों पर तीन तरह की लापरवाही के आरोप
फोरेंसिक ऑडिट में बताया गया है कि सरकार की स्कीम के तहत किसानों की जमीनों के अधिग्रहण का मकसद रियल एस्टेट को प्रमोट करना था, लेकिन जमीनों को 10 प्रतिशत कीमत पर आवंटित करने, अलॉटमेंट का प्रीमियम तक नहीं वसूलने और बिल्डरों को अवैध तरीके से जमीनों का आवंटन कर प्राधिकरणों ने भी फर्जीवाड़े में सहयोग किया।

पैसे डायवर्ट होते रहे, बैंकों ने मूंदी आंखें
फोरेंसिक ऑडिट की रिपोर्ट से यह पता चलता है कि चार सरकारी बैंकों ने फंड के दुरुपयोग पर आंखें मूंद ली। यही नहीं फंड का डायवर्जन होता रहा और बैंकों ने कुछ भी नहीं किया। आम्रपाली जोडिएक के मामले में बैंकों के दिए पैसों को रसीद पर ही दूसरी जगह तुरंत डायवर्ट कर दिया गया। आम्रपाली प्रिंसले एस्टेट के मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला।

अल्ट्रा होम कंस्ट्रक्शन के नाम से शुरू किया काम
आम्रपाली समूह ने अल्ट्रा होम कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के नाम से 2003 में काम शुरू किया। इस दौरान कम कीमत के फ्लैट बनाने के प्रोजेक्ट पर काम किया और इंदिरापुरम व ग्रेटर नोएडा सहित अन्य स्थानों पर पांच प्रोजेक्टों पर काम किया। इसके बाद कंपनी ने नोएडा-ग्रेटर नोएडा में बड़े प्रोजेक्टों पर काम शुरू किया।
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