आम्रपाली समूह ने सेंचुरियन पार्क और ड्रीम वैली प्रोजेक्ट के लिए आवंटित जमीनों को कुछ अन्य डेवलपर्स को बेचा। इससे उसे 66 करोड़ रुपये की आय हुई। यहां यह सवाल उठाया गया कि बिना बकाया चुकाए सबलीज डीड कैसे संभव हो पाई। इस मामले में प्राधिकरणों पर भी सवाल उठाए गए हैं। यही नहीं जिन डेवलपर्स को प्लॉट बेचे, उनके साथ भी आम्रपाली के संबंध पाए गए।
प्राधिकरणों पर तीन तरह की लापरवाही के आरोप
फोरेंसिक ऑडिट में बताया गया है कि सरकार की स्कीम के तहत किसानों की जमीनों के अधिग्रहण का मकसद रियल एस्टेट को प्रमोट करना था, लेकिन जमीनों को 10 प्रतिशत कीमत पर आवंटित करने, अलॉटमेंट का प्रीमियम तक नहीं वसूलने और बिल्डरों को अवैध तरीके से जमीनों का आवंटन कर प्राधिकरणों ने भी फर्जीवाड़े में सहयोग किया।
पैसे डायवर्ट होते रहे, बैंकों ने मूंदी आंखें
फोरेंसिक ऑडिट की रिपोर्ट से यह पता चलता है कि चार सरकारी बैंकों ने फंड के दुरुपयोग पर आंखें मूंद ली। यही नहीं फंड का डायवर्जन होता रहा और बैंकों ने कुछ भी नहीं किया। आम्रपाली जोडिएक के मामले में बैंकों के दिए पैसों को रसीद पर ही दूसरी जगह तुरंत डायवर्ट कर दिया गया। आम्रपाली प्रिंसले एस्टेट के मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला।
अल्ट्रा होम कंस्ट्रक्शन के नाम से शुरू किया काम
आम्रपाली समूह ने अल्ट्रा होम कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के नाम से 2003 में काम शुरू किया। इस दौरान कम कीमत के फ्लैट बनाने के प्रोजेक्ट पर काम किया और इंदिरापुरम व ग्रेटर नोएडा सहित अन्य स्थानों पर पांच प्रोजेक्टों पर काम किया। इसके बाद कंपनी ने नोएडा-ग्रेटर नोएडा में बड़े प्रोजेक्टों पर काम शुरू किया।