कागजों पर हो रहा प्रदूषण नियंत्रण, जिम्मेदार एजेंसियां बेपरवाह, शिकायतों के निपटारे में डीजेबी और एमसीडी सबसे फिसड्डी, यमुना नदी भी शुद्ध होने के लिए लगा रही गुहार...
राजधानी में हवा से लेकर पानी तक प्रदूषित है। प्रदूषण नियंत्रण को लेकर सरकारी वादे, विभागीय कार्यवाही और कोर्ट के आदेश के बाद भी कोई खासा असर नहीं दिखता। यमुना नदी वर्षों से अपनी सांसों के लिए गुहार लगा रही है, लेकिन स्थिति जस की तस है।
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वायु प्रदूषण हर वर्ष दिल्ली को गैस चैंबर बना रहा है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि समय तो बदला, लेकिन हालात नहीं बदले हैं। प्रदूषण को कागजों में ही नियंत्रित किया जा रहा है। वायु प्रदूषण से संबंधित अलग-अलग एजेंसियों को प्राप्त 35 फीसदी शिकायतें अपने निस्तारण की बाट जोह रही हैं। प्रदूषण से जुड़ी शिकायतों के निपटारे में सबसे फिसड्डी दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) है। इसके बाद दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) का नंबर आता है। इसके चलते परिस्थितियां निरंतर विकट होती जा रही हैं।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़ों के मुताबिक, प्रदूषण के मामले में सबसे अधिक शिकायतें एमसीडी को प्राप्त हुई हैं। इसमें 4415 शिकायत में से केवल 2427 शिकायतों का निस्तारण किया गया है। 45 फीसदी अभी भी अनसुलझी हैं। डीजेबी को 192 शिकायतें मिलीं। इसमें 56 प्रतिशत शिकायतों पर अभी तक एजेंसी ने ध्यान ही नहीं दिया है। यह सभी शिकायतें 15 अक्तूबर, 2021 से लेकर 28 नवंबर, 2024 तक समीर एप पर प्राप्त हुईं। इस वर्ष एक दिसंबर तक 135 दिन ऐसे रहे जब वायु गुणवत्ता बेहद खराब रही। जबकि, इस वर्ष अब तक 11 दिन हवा गंभीर श्रेणी में दर्ज की गई।
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वहीं, 2023 में 126 दिन ऐसे थे जब हवा खराब दर्ज की गई थी। वहीं, 12 दिन गंभीर श्रेणी के थे। ऐसे में प्रदूषण को कम करने की जिम्मेदारी जिस विभाग व एजेंसियों की है, वह अर्ध नींद में हैं। प्रदूषण से संबंधित शिकायतों का निपटारा कागजों और फाइलों में स्थिति को सुधारा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय से शिकायतों को सुलझाया नहीं जाता तो स्थिति और खराब होती है। यह आंकड़े विभागों व एजेंसियों के दावों की पोल खोल रहे हैं।
80 प्रतिशत प्रदूषण दिल्ली से यमुना नदी में
यमुनोत्री से निकलकर संगम तक जाने वाली यमुना नदी का मात्र दो फीसदी हिस्सा दिल्ली से होकर गुजरता है, लेकिन इसमें प्रदूषण फैलाने में राजधानी का ही सबसे बड़ा हिस्सा माना जाता है। एक अध्ययन के अनुसार यमुना लगभग 80 फीसदी प्रदूषित दिल्ली में होती है। इसे ऐसा समझा जा सकता है कि दिल्ली में अगर यमुना नदी को देखा जाए तो उसमें भारी मात्रा में सफेद झाग नजर आता है। वह कुछ और नहीं बल्कि पानी में अमोनिया की मात्रा बढ़ने की वजह से बनने वाला झाग होता है।
पेड़-पौधों के साथ बेजुबानों को भी कर रहा बीमार ः बेजुबान पशु-पक्षी इस दमघोंटू हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। स्मॉग की मोटी चादर छाने से पक्षियों की दृश्यता पर असर पड़ रहा है। यही नहीं, उनके फेफड़ों में भी संक्रमण फैल रहा है। आलम यह है कि वे भोजन की तलाश में ऊंचाई तक उड़ान भी नहीं भर पा रहे हैं। इसका सीधा असर उनकी विकास दर पर पड़ रहा है। पेड़-पौधों में भी इसका गंभीर असर देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो घने प्रदूषण ने पेड़-पौधों के कुदरती विकास को तो धीमा किया ही है, साथ ही प्रदूषकों को सोखने की इनकी क्षमता भी खत्म की है।