फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस: कड़े संघर्षों को पार कर नसरीन बनीं राष्ट्रीय महिला खो-खो टीम की कैप्टन

Wed, 12 Aug 2020 04:18 AM IST
दुष्यंत शर्मा आदित्य पाण्डेय, नई दिल्ली

सार

  • नसरीन ने बचपन से बुरे दौर का सामना किया है, अभी भी वह इससे उबर नहीं पाई हैं, लेकिन उन्होंने आगे बढ़ना नहीं छोड़ा है
  • बचपन से ही तेज फर्राटे भरने वाली नसरीन की शिक्षक ने किया प्रेरित तो वह देश के लिए जीत लाईं सोना
विज्ञापन
नसरीन अपने माता-पिता के साथ... - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

शकूरपुर की नसरीन शेख मौजूदा समय में भारतीय महिला खो-खो टीम की कप्तान हैं। बीते साल दिसंबर में नसरीन की अगुवाई में भारत ने नेपाल को हराकर साउथ एशियन गेम्स में गोल्ड जीता था। कड़े संघर्षों को पार कर नसरीन ने यह मुकाम हासिल किया है। संघर्षों ने अभी भी उनका पीछा छोड़ा नहीं है, लेकिन वह इसे नजरंदाज कर आगे बढ़ना चाहती हैं। अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के मौके पर नसरीन का जीवन दूसरे युवाओं के लिए प्रेरणा श्रोत बन सकता है।

विज्ञापन


नसरीन ने बताया कि उनके पांच भाई, सात बहन और अम्मी-अब्बू, इतने बड़े परिवार में कमाने वाले केवल अब्बू हैं। नसरीन के अब्बा मंगोलपुरी, त्रिनगर, शास्त्री नगर व आजादपुर में साप्ताहिक बाजारों में बरतन बेचते हैं। अकेले की कमाई से जो आमदनी होती है उसी से बचाकर उन्होंने दो बड़ी बेटियों का विवाह भी किया है। 

तीसरे नंबर की बेटी नसरीन को बचपन से फर्राटे भरने का शौक था। उनकी खूबी को उनकी शिक्षिका सुशीला मैडम ने पहचाना और उन्हें खो-खो खेलने के लिए प्रेरित किया। नसरीन तीसरी कक्षा में थीं लेकिन शिक्षिका की बात मानते हुए परिवार की रजामंदी से उन्होंने नियमित खो-खो खेलना शुरू कर दिया। छठवीं कक्षा में जाने पर उनका चयन राष्ट्रीय टीम में हो गया। 23 वर्षीय नसरीन अबतक 40 नेशनल व तीन इंटरनेशनल मैच खेल चुकी हैं।
विज्ञापन


नसरीन ने बताया कि कोरोना महामारी के इस दौर में पिता का धंधा बिल्कुल बंद पड़ गया। घर में आय का श्रोत खत्म हो जाने से उनके परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा है। यहां तक कि नसरीन अपनी तय डाइट भी लेने में सक्षम नहीं थीं। बाद में भारतीय खो-खो महासंघ (केकेएफआई) ने उन्हें एक लाख रुपए की आर्थिक मदद की। फिलहाल उनके सभी छोटे भाई-बहन पढ़ रहे हैं। 

वह भी दिल्ली विश्व विद्यालय के दौलत राम कॉलेज से बीए- प्रोग्राम की पढ़ाई कर रही हैं, यह उनकी तीसरा वर्ष है। नसरीन कहती हैं कि उन्होंने रूढ़िवादी प्रथाओं को तोड़कर यह मुकाम हासिल किया है। शुरुआत में खेल के दौरान पहने जाने वाले उनके छोटे कपड़ों को लेकर रिश्तेदार ताने कसते थे। लेकिन उनके पिता ने इसमें उनका पूरा साथ दिया। अब वह हर विषम परिस्थिति से लड़ने को तैयार हैं।

विज्ञापन

खेलने से ही होगी समाज की तरक्की : मधु मालीवाल

मधु - फोटो : अमर उजाला
दिल्ली देहात में स्थित डिचाऊं कला की 22 वर्षीय मधु मालीवाल मौजूदा समय इंडियन रेलवे में सीनियर क्लर्क हैं। इसके अलावा वह नेशल कबड्डी खिलाड़ी भी हैं। पूर्व में उन्होंने दिल्ली कबड्डी टीम के कैप्टन की जिम्मेदारी भी निभाई है। स्कूल के समय से ही उन्हें कबड्डी में दिलचश्पी हो गई थी। पिता ट्रांसपोर्ट का बिजनेस चलाते थे।

संभ्रांत परिवार में होने के बावजूद गांव की दकियानूसी विचारधारा मधु को आगे कबड्डी खेलने से रोक रही थी। लेकिन पिता ने मधु को आगे बढ़ने में सहयोग किया। जिसके कारण उन्हें यह मुकाम हासिल हो सका। मधु का कहना है कि अधिक से अधिक युवा किसी खेल में हिस्सा लेंगे तो समाज अपने आप तरक्की करने लगेगा।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें