नारद मोह के मंचन के साथ ही जैकमपुरा में रामलीला का आगाज हुआ। श्री दुर्गा रामलीला कमेटी द्वारा इसका मंचन किया जा रहा है। बृहस्पतिवार की रात नारद की भूमिका निभाने वाले कलाकार सुनील चिटकारा ने अपने अभिनय से सभी को खूब आनंदित किया।
उनकी अदाकारी से दर्शक हंस कर लोटपोट होते रहे। पिछले कई वर्षों से वह नारद की भूमिका निभा रहे हैं। रामलीला की शुरुआत आरती से हुई। पहले दृश्य में हिमालय पर्वत के पास एक बड़ी पवित्र गुफा थी।
जिस पर नारद जी की नजर पड़ी। उन्हें वह अत्यंत सुहावनी लगी। पर्वत, नदी और वन को देख कर विष्णु जी की भक्ति उनमें बलवती होने लगी और वह वहीं पर समाधि लगा तपस्या में लीन हो गए।
नारद मुनि की इस तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो उठे कि कहीं देवर्षि नारद अपने तप के बल से इंद्रपुरी को अपने अधिकार में न ले लें। इंद्र ने नारद की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को उनके पास भेज दिया।
कामदेव ने अपनी माया से बसंत ऋतु का सृजन किया। वृक्षों और लताओं में रंग-बिरंगे फूल खिल गए। अप्सराएं नृत्य करने लगीं और गाना गाने लगीं। कामदेव की किसी भी कला का नारद पर प्रभाव नहीं पड़ा।
तब कामदेव को भय सताने लगा कि कहीं देवर्षि मुझे शाप न दे दें। हारकर वह देवर्षि के चरणों में गिर क्षमा मांगने लगे। मुनि को थोड़ा भी क्रोध नहीं आया। उन्होंने कामदेव को क्षमा कर दिया।
कामदेव को जीतने के बाद उनके मन में अहंकार के बीज अंकुरित होने लगे। वह शिव जी के पास पहुंचे और सारा विवरण दिया। भोले नाथ समझ गए कि इन्हें अहंकार हो गया है।
यह बात विष्णु जी जान गए तो देवर्षि का अहित ही होगा। नारद से कहा कि तुमने जो कथा मुझे बताई है उसे श्री हरि को मत बताना। नारद को यह बात अच्छी नहीं लगी।
वह क्षीरसागर में पहुंच गए उनकी बात सुनने के बाद वह समझ गए कि उनके भक्त के मन को अहंकार ने घेर लिया है। उन्होंने अपनी माया से विश्वमोहिनी के स्वयंवर का सृजन किया। वहीं पर नारद का मोहभंग होता है।