ऐसे में जिन क्षेत्रों में मेट्रो या वैकल्पिक तेज सार्वजनिक परिवहन नहीं है, वहां रहने वाले लोगों के लिए समय एक महंगी कीमत बन चुका है। जानकार बताते हैं कि अगर कोई व्यक्ति नरेला से रोज मध्य दिल्ली काम के लिए आता है, तो आने-जाने में चार घंटे खर्च हो सकते हैं। सप्ताह में 20 घंटे, महीने में लगभग 80 घंटे। यानी एक अतिरिक्त कार्य सप्ताह सिर्फ यात्रा में। विशेषज्ञ मानते हैं कि समय की यह असमानता सामाजिक और आर्थिक असमानता को भी बढ़ाती है। जिन क्षेत्रों में तेज कनेक्टिविटी है, वहां संपत्ति मूल्य और अवसर अधिक बढ़ते हैं। जहां नहीं है, वहां विकास की गति धीमी पड़ती है।
रैपिड रेल ने बनाया रिकॉर्ड
सराय काले खां तक पहुंचने के दूसरे दिन सोमवार रैपिड रेल ने रिकार्ड कायम किया है। दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ कॉरिडोर पर रात दस बजे तक एक लाख से ज्यादा यात्रियों ने सफर किया। एनसीआरटीसी अधिकारियों के अनुसार, एक दिन में यात्रियों की संख्या रिकार्ड पर पहुंच गई है।
संतुलित मॉडल की जरूरत : डॉ. छिकारा
दिल्ली परिवहन विभाग के पूर्व उपायुक्त डॉ. अनिल छिकारा ने कहा कि राजधानी का ट्रांसपोर्ट मॉडल अब दो ध्रुवों के बीच खड़ा है, एक ओर हाईस्पीड रीजनल कनेक्टिविटी और दूसरी ओर धीमी लोकल कनेक्टिविटी। आवश्यकता इस बात की है कि दोनों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। उन्होंने कहा कि विकसित शहरों में शहरी यातायात की औसत गति लगभग 30 किलोमीटर प्रति घंटा मानी जाती है, जो एक अंतरराष्ट्रीय मानक है। इसके मुकाबले दिल्ली में वाहनों की औसत गति कई प्रमुख मार्गों पर 10 किलोमीटर प्रति घंटा के आसपास सिमट जाती है।