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मदर्स डे: पति के निधन के बाद भी नहीं डिगा हौसला, बच्चियों की कामयाबी से मिला सुकून

Sun, 12 May 2019 06:50 AM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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दोनों बेटियों और बेटे के साथ सोनी नेगी - फोटो : अमर उजाला
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वर्ष 1993 में शादी के करीब 10 वर्ष बाद ही मेरे पति का निधन हो गया था। उस वक्त मैं 32 साल की थी। तीन मासूम बच्चों को देख मेरी हर पल ममता रोती थी। शायद यही मेरे लिए सबसे बड़ी ताकत भी बनी। ये कहना है दिल्ली के मंडावली निवासी सोनी नेगी का। सोनी की दो बेटियां और एक बेटा है। बड़ी बेटी अपेक्षा निजी बैंक में कर्मचारी है तो दूसरी बेटी आकांक्षा गुरुग्राम में एक निजी कंपनी में। बेटे हर्षित ने हाल ही में 12वीं में 70 फीसदी अंक हासिल किए हैं। अब दोनों बहनें मिलकर उसका भविष्य संवारने में जुटी हैं। इसी खुशी में झलकते आंसुओं को पोंछते हुए सोनी कहती हैं कि रोती ममता को अब सुकून मिल रहा है। 

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सोनी बताती हैं कि बुरे वक्त में परिवार ने पूरा सहयोग दिया, लेकिन बच्चों को पालने के लिए नाकाफी था, इसलिए सबसे पहले उत्तराखंड का ऊधमसिंह नगर छोड़ा। वहां से वे सीधे कोटद्वार आ पहुंची, जहां उन्होंने सिलाई-कढ़ाई और पेंटिंग करते हुए बच्चों की पढ़ाई शुरू कराई। बच्चे बड़े होने लगे, दिन में 14 से 16 घंटे काम में ही व्यस्त रहती थी। वे चाहती थीं कि उनके बच्चे इस लायक बने कि वे अपने जीवन में सब कुछ हासिल कर सकें।

दिल्ली जैसे शहर में अपना भविष्य तलाशने के लिए उन्होंने बच्चों को भेज दिया। खर्च ज्यादा होने के कारण बेटियों ने पहले बीए की और फिर एलआईसी एजेंट बनने के बाद बेहतर काम दिखाया। उनकी मेहनत भी रंग लाई और वे अपने बच्चों का सपना पूरा करने के लिए दिल्ली आ गईं। दोनों बेटियों ने उनकी मेहनत को लक्ष्य तक पहुंचाने का फैसला लिया और आज एक बैंक में है तो दूसरी प्राइवेट कंपनी में। वे अपनी बेटियों की तरक्की देख आज बहुत खुश हैं। 

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पति का साथ छूटा, मजदूरी कर बेटों को बनाया कामयाब

कंचन देवी, उम्र 49 साल। एक बेटा विकास फैशन डिजाइनर तो दूसरा आशीष दिल्ली के निजी अस्पताल में एमबीबीएस के बाद प्रशिक्षण ले रहा है। दिल वालों की दिल्ली में कंचन देवी की कहानी वाकई चौंकाने लायक है। 22 साल की उम्र में ही उनके पति का साथ छूट गया। छोटे बच्चों को देख वे रोतीं और बाद में खुद को ही तसल्ली देती थीं। मूलरूप से बिहार के भागलपुर निवासी कंचन देवी बताती हैं कि पति के जाने के कुछ समय तक वे अंधेरे की जिंदगी में रहीं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें।

दिल्ली के भाटी माइंस निवासी कंचन देवी ने तकलीफों से हारने की जगह सामना करने की ठानी। वे दिन में 5 हजार रुपये प्रतिमाह की मजदूरी करती थीं और रात को दूसरी फैक्ट्री में जाकर नौकरी करतीं। मेहनत की तपिश से उन्होंने अपने दोनों बेटों को पाला। सरकारी स्कूल में पढ़ने के बाद बच्चे भी जब समझदार हुए, तो मां के सूखे आंसुओं में फिर से धारा प्रवाह होने लगी। कंचन देवी अब अपने बच्चों की तारीफ करते थकती नहीं हैं। वे कहती हैं कि उनकी मेहनत के साथ बच्चों का अथक परिश्रम ही आज उनको इस मुकाम पर लाया है।

परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूटा पर बच्चों को बनाया डॉक्टर
विपरीत परिस्थितियों में भी खुद को मजबूत रखते हुए एक मां ऐसी हैं, जिन्होंने बेटी को डॉक्टर बनाकर अपना सपना पूरा किया। 55 वर्षीय मिथलेश तोमर की बेटी अंकिता दिल्ली के ही बाड़ा हिंदूराव अस्पताल में एनेस्थिसिया की डॉक्टर हैं। आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा स्थित सिद्धार्थ मेडिकल कॉलेज से अंकिता ने एमबीबीएस की है। 147वीं रैंक लाकर उन्हें एमबीबीएस के लिए प्रवेश मिला था। अंकिता का भाई अंकुर मंडोली जेल में मेडिकल ऑफिसर है। मूलरूप से यूपी के बुलंदशहर निवासी मिथलेश बताती हैं कि वे अपने दोनों बच्चों को डॉक्टर बनाना चाहती थीं। परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूटने के बाद भी उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया। बच्चों की हिम्मत बांधने के लिए उन्होंने अपने मन पर पत्थर सा रख लिया था। बच्चों का सपना पूरा करना उनकी जिद बन चुका था, जिसका परिणाम है कि आज उनके दोनों बच्चे डॉक्टर हैं। मिथलेश बताती हैं कि वे अपने बच्चों को डॉक्टर इसलिए बनाना चाहती थी, ताकि समाज की सेवा से वे जुड़े रहें।

दूध बेचकर संभाला परिवार, आज खुशियां ही खुशियां
1984 में टीबी की बीमारी के चलते पति का साथ छूट गया। घर पर न कोई साधन, न कोई अन्य सहयोग। खेती भी ज्यादा न थी, तीन लड़के और तीन ही लड़कियों के इस परिवार पर खुशियां मानों मुंह चिड़ा रहीं थीं। बच्चों की परवरिश और उनकी पढ़ाई लिखाई एक बड़ी चुनौती थी, फिर भी दूध बेचकर उन्होंने किसी तरह खुद को खड़ा किया और बच्चों को संभाला भी। मूलरूप से उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुरी निवासी अनारा देवी बताती हैं कि आज उनके दो बेटे दिल्ली में ही सिविल इंजीनियर हैं जबकि सबसे छोटा बेटा सुरेश दत्त शुक्ला एसआरडी कंपलीट वॉटर प्रूफिंग सॉल्यूशन नाम की स्टार्टअप कंपनी के मालिक हैं। आज पूरा परिवार दिल्ली के बदरपुर इलाके में रहता है। वे अभी भी अपने संघर्ष की कहानी नाती-पोतों को सुनाती हैं ताकि वे भविष्य में कुछ सीख लेकर कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ें। सुरेश दत्त शुक्ला का कहना है कि मां और उसकी ममता का कोई मोल नहीं होता। हम जैसे बच्चों के लिए तो खासतौर पर, जिनके पिता का साथ एक साल की उम्र में ही छूट गया था।
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