अध्ययन में पता चला कि घरों में फफूंद के बीजाणु विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सुरक्षित सीमा से 12 गुना और बैक्टीरिया का स्तर 10 गुना अधिक है। यह स्थिति निवासियों में सांस संबंधी समस्याओं, त्वचा की एलर्जी और मानसिक चिंता को बढ़ा रही है।
सर्दियों के मौसम में बाहर के साथ ही घर के भीतर की हवा भी बेहद खतरनाक है। इसका खुलासा दिल्ली विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया और साउथ डकोटा स्टेट यूनिवर्सिटी के संयुक्त अध्ययन में हुआ है।
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अध्ययन में पता चला कि घरों में फफूंद के बीजाणु विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सुरक्षित सीमा से 12 गुना और बैक्टीरिया का स्तर 10 गुना अधिक है। यह स्थिति निवासियों में सांस संबंधी समस्याओं, त्वचा की एलर्जी और मानसिक चिंता को बढ़ा रही है। फ्रंटियर्स इन पब्लिक हेल्थ 2025’ में प्रकाशित इस अध्ययन में उत्तरी दिल्ली के अशोक विहार और आजादपुर की झुग्गी बस्तियों के 336 घरों से एक साल तक हवा के नमूने लिए गए। अध्ययन में पाया गया कि फफूंद के कण 2.5 माइक्रोन से छोटे हैं, जो फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश कर गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। सितंबर-नवंबर के बीच फफूंद का स्तर 6,050 सीएफयू प्रति घन मीटर तक पहुंचा, जबकि डब्ल्यूएचओ की सुरक्षित सीमा 500 सीएफयू है। बैक्टीरिया का स्तर अगस्त में चरम पर था।
स्वास्थ्य प्रभावों पर अध्ययन के निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं। 33 फीसदी निवासियों ने सिरदर्द, 23 फीसदी ने आंखों में जलन, 22 फीसदी ने खांसी और सांस की तकलीफ, और 18 फीसदी ने एलर्जिक राइनाइटिस की शिकायत की। बच्चे और युवा सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, जिसमें 28% बच्चे (12 वर्ष से कम) और 25 फीसदी युवा (18-30 वर्ष) सांस की समस्याओं से पीड़ित हैं।
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महिलाओं में त्वचा और आंखों की शिकायतें 60% तक रहीं
महिलाओं में त्वचा और आंखों की शिकायतें 60 फीसदी तक रहीं, संभवतः घर में अधिक समय बिताने के कारण। शोधकर्ताओं ने खराब वेंटिलेशन, उच्च आर्द्रता, और बाहरी धुंध को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। मौसमी बदलावों में पतझड़ और सर्दियों में फफूंद का स्तर बढ़ता है, जबकि गर्मियों में बैक्टीरिया की मात्रा अधिक थी। अध्ययन में चेतावनी दी गई कि एस्परगिलस और पेनिसिलियम जैसे फफूंद माइकोटॉक्सिन उत्पन्न करते हैं, जो सिरदर्द, थकान और फेफड़ों की गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं।