गरीबों का हक दिलाने का ढिंढोरा पीटने वाली प्रदेश सरकार उनका अच्छे अस्पतालों में इलाज तक नहीं करा पा रही है। सरकार से रियायती दर पर जमीन लेने वाले अस्पतालों में बीपीएल और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के मरीजों के लिए प्रावधान होने के बावजूद उन्हें इसका लाभ नहीं मिल रहा।
वर्ष 2012 से दिसंबर 2015 तक प्रशासन ने महज 16 मरीजों को ही निजी अस्पतालों में रियायती दर पर इलाज के लिए रेफर किया। जबकि प्रति वर्ष सिविल अस्पताल से करीब 2700 मरीजों को रेफर किया जाता है।
दरअसल, शहर के तीन नामचीन अस्पताल मेदांता, फोर्टिस और आर्टिमिस जैसे अस्पतालों ने हुडा से रियायती दरों पर जमीन ली है। इसके बदले बीपीएल और आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों का मुफ्त इलाज का प्रावधान किया गया था, लेकिन इन अस्पतालों पर लगातार आरोप लगते रहे हैं कि यह मुफ्त में इलाज करने को तैयार नहीं होते।
हाल ही में हुडा प्रशासक, सिविल सर्जन और निजी अस्पतालों के प्रतिनिधियों की बैठक के बाद जरूरतमंद श्रेणी के मरीजों के लिए अलग से रजिस्ट्रेशन काउंटर बनाया गया, लेकिन वो महज दिखावा साबित हो रहा है। कितने मरीज प्रतिदिन आए और उन्हें क्या सुविधा दी गई? इसका रिकॉर्ड तैयार करने को कहा गया था, लेकिन इस पर आज तक सही से अमल नहीं हुआ।
लापरवाह है सरकारी तंत्र
रिकॉर्ड पर नजर डालें तो सिविल सर्जन कार्यालय से वर्ष 2012 से 2014 तक केवल चार मरीजों को रेफर किया गया था, जबकि 2015 में 15 मरीजों को रेफर किया गया था। इनमें तीन मरीज दूसरे जिले के थे, जिसके वजह से यह गुड़गांव के खाते में नहीं जोड़ा जा सकता है।
आरटीआई कार्यकर्ता हरिंद्र धींगड़ा कहते हैं कि व्यवस्था पर ही इन अस्पतालों ने कब्जा कर रखा है। स्वास्थ्य विभाग और हुडा दोनों ही लापरवाह हैं। अस्पतालों ने अपने फाउंडेशन बना रखे हैं। फाउंडेशन के तहत इलाज कराने वालों को भी इसी में दिखाकर घालमेल किया जाता है।
सिविल अस्पताल से नहीं करते रेफर
सरकारी तंत्र भी इतना ढीला है कि इसका फायदा निजी अस्पताल वाले उठा रहे हैं। सिविल अस्पताल में आने वाले गरीब मरीजों को इन निजी अस्पतालों में रेफर नहीं किया जाता है। सभी मरीजों को दिल्ली के सफदरजंग या अन्य सरकारी अस्पतालों में भेजा जाता है।
जबकि इसके लिए अलग से काउंटर बनाया गया है। मरीजों को जानकारी नहीं होने की वजह से इमरजेंसी से ही मरीज लौट जाते हैं। अधिकारियों का कहना है कि बड़े अस्पतालों के तामझाम को देखते हुए गरीब वर्ग के लोग इनमें कदम भी नहीं रखते।
क्या है नियम
नियम के मुताबिक सरकारी रियायत दर पर ली अस्पतालों में 70 फीसदी रियायती दर पर इलाज देना अनिवार्य है। यानी अगर इलाज पर कुल खर्च एक हजार रुपये आते हैं तो 700 रुपये छूट मिलेगी। इस लाभ के लिए सिविल सर्जन कार्यालय से रेफर किए जाने का प्रावधान है। अस्पताल के कुल ओपीडी का 20 फीसदी मरीज बीपीएल, आर्थिक रूप से कमजोर और हरियाणा सरकार के चतुर्थ श्रेणी से तय किए गए हैं। ईडब्ल्यूएस के लिए नियोक्ता द्वारा प्रमाण पत्र होना जरूरी है। जबकि बीपीएल के लिए बीपीएल कार्ड अनिवार्य है।
इलाज के लिए लड़ी जा चुकी है लड़ाई
भोड़सी में रहने वाले मोनू के 11 महीने के मासूम बच्चे मनीष की सांस लेने व खाने की नली एक ही थी। जिसका ऑपरेशन के लिए यहां के सिविल सर्जन कार्यालय से लेकर मंत्री तक गुहार लगा चुके थे। बीपीएल में होने के बावजूद इन अस्पतालों ने इलाज से मना कर दिया। किसी तरह फिर एम्स में इलाज कराया गया।
स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं है रिकॉर्ड
सिविल सर्जन डॉ. रमेश धनखड़ का कहना है कि सिविल अस्पताल द्वारा रेफर किया जाने का प्रावधान है। कितने लोगों का इलाज होता है या नहीं होता है, अस्पताल के पास कार्रवाई करने का भी कोई अधिकार नहीं है। बता दें कि हुडा प्रशासक की अध्यक्षता में चार सदस्यीय टीम है, जिसका काम नियमों को लागू कराना है।