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'350 लाशें पड़ी थीं और मैं अपने भाई को तलाश रहा था'

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हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई, सिख कौम कहां से आई। ठीक तीस साल पहले ऐसा ही नारा पूरे त्रिलोकपुरी में गूंज रहा था। उस वक्त कंवलजीत सिंह की उम्र 16 साल थी। 30 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए दंगों में त्रिलोकपुरी के एक ही ब्लॉक में 350 से ज्यादा सिखों को मौत के घाट उतार दिया गया था।
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जी हां, यह वही त्रिलोकपुरी इलाका है जो दिवाली के दिन से हिंदू-मुस्लिम दंगों की चपेट में है। 84 में कंवलजीत के घर पर दंगाइयों ने हमला किया। उनके दो भाइयों को उनके सामने खींच कर ले गए। कंवलजीत किसी तरह भागने में सफल हो गए। मैं अपने भाइयों को इधर-उधर तलाश रहा था तभी एक पड़ोसी ने बताया कि उनके दोनों भाइयों को जिंदा जला दिया गया है।

कंवलजीत को आज तक अपने भाइयों की लाश नहीं मिली। फिलहाल उनकी उम्र 46 साल है। उनके दो बेटे हैं। एक की उम्र 8 और दूसरे की उम्र 21 साल है। इस बार के दंगे ने उन्हें फिर से दहला दिया। वह जब भी अपने दोनों बेटों को देखते हैं उन्हें अपने दोनों भाइयों की याद आती है।
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लाशों को ट्रकों में भर कर ले जाया गया

कंवलजीत बताते हैं कि उस वक्त हिंदू-मुसलमान का कोई अंतर नहीं रह गया था। सब केवल सिखों को खोज-खोज कर मौत के घाट उतार रहे थे। त्रिलोकपुरी के पूरे इलाके में चारों ओर जली-कटी लाशें पड़ी हुई थीं। कुछ दिन बाद लाशों के इन टुकडों को ट्रकों में भर कर ले जाया गया था।

2014 में दिवाली के दिन एक बार फिर अक्टूबर के ही महीने में त्रिलोकपुरी दंगों की चपेट में आ गया। दंगों की आहट होते ही कंवलजीत अपने बच्चों को लेकर वहां से हट गए। पिछले एक हफ्ते से वह अपने रिश्‍स्तेदार के यहां रह रहे हैं।

दंगों के चलते उनके किरायेदारों ने मकान खाली कर दिया है। 84 के दंगों में कंवलजीत के दोनों हाथ में ऐसी चोट लगी थी कि उन्हें मैकेनिक का अपना काम छोड़ना पड़ा था। तब से किराया ही उनकी आमदनी का जरिया है। इन दंगों की वजह से उस पर भी खतरा मंडराने लगा है।
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इस बार वह अपने बेटों को खोना नहीं चाहते

कंवलजीत का कहना है कि 84 दंगों में भी मेरी और मेरे पड़ोसी की जान बचाने वाला एक मुस्लिम और वाल्मिकी परिवार ही था। उनका एक दोस्त तो अपने पड़ोसी के यहां तीन दिन तक एक बक्से में छिपा रहा।

कई लोगों ने डर के चलते अपनी दाढ़ी-मूंछ भी मुंडवा ली थी। वह हिंदू की तरह दिखना चाहते थे और आज भी उनमें से कई वैसे ही रहते हैं।

दंगों का डर आज भी कंवलजीत को 84 की याद दिलाता है। इस बार वह अपने बच्चों को इसका शिकार नहीं बनने देना चाहते। उन्होंने अपनी पत्नी से किसी भी समय घर छोड़ने के‌ लिए तैयार रहने को कह दिया है।

कंवलजीत की यह कहानी साफ इशारा है कि दंगों के कहर के शिकार वो लोग होते हैं जो खुद किसी पर हमला नहीं करते। कंवलजीत ने डर की वजह से अपना घर छोड़ दिया है। देखना है कि क्या वह वापस घर जा पाएंगे।

फोटो व स्टोरी साभार: hindustantimes.com
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