संविधानिक ढांचे के उलट कार्रवाई, लोकतंत्र के विनाश के समान
सिसोदिया ने लिखा है कि जीएनसीटीडी अधिनियम साफ तौर से स्पष्ट करता है कि उपराज्यपाल को केवल ऐसे मामलों में स्वनिर्णय का अधिकार है जो विधानसभा को दी हुई शक्तियों के दायरे से बाहर है। और जिसे लेकर उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा शक्तियां या कार्य सौंपे गए हैं। इसके अलावा उन मामलों में जहां उन्हें किसी कानून के तहत या इस तरह के स्वनिर्णय का प्रयोग करने की आवश्यकता है। इसके अलावा सांविधानिक प्रावधान भी कैबिनेट की सलाह पर काम करने का प्रावधान करते हैं। अगर सांविधानिक ढांचे के उलट कार्रवाई होती है तो यह लोकतंत्र के विनाश के समान होगा।
सहायता और सलाह’ पर कार्य करने के लिए बाध्य
पत्र में सिसोदिया ने कहा है कि टीबीआर, 1993 का नियम 19(5) माननीय उपराज्यपाल को किसी भी विभाग में किसी भी प्रस्ताव या मामले से संबंधित कागजात मंगवाने का अधिकार देता है। हालांकि, पहले से उल्लेखित कानूनी और संविधानिक स्थिति के मद्देनजर उपराज्यपाल किसी भी मामले के संबंध में किसी भी स्वतंत्र निर्णय लेने वाले प्राधिकरण के साथ निहित नहीं हैं, अर्थात ‘हस्तांतरित विषयों’ से संबंधित हैं। वह संविधान की 7वीं अनुसूची और मंत्रिपरिषद द्वारा उन्हें दी गई ‘सहायता और सलाह’ पर कार्य करने के लिए बाध्य हैं। उपमुख्यमंत्री ने गुजारिश की है कि उपराज्यपाल के हालिया कार्य, मंत्रिपरिषद को दरकिनार कर स्थानांतरित विषयों पर अधिकारियों को सीधे आदेश देना, सर्वोच्च न्यायालय के कानून और आदेशों के विपरीत है। उपमुख्यमंत्री ने कहा है कि उपराज्यपाल इस पर पुनर्विचार करें। इससे विवादों से बचा जा सकेगा।