दिल्ली के सियासी दंगल में आम आदमी पार्टी के मुकाबले खस्ता हालत होने के बावजूद भाजपा के कई बड़े दिग्गज चेहरे गायब हैं। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं को चुनावी रणनीति से लेकर प्रचार अभियान में ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई है।
चुनाव की कमान ऐसे हाथों में है जिनका खुद कभी चुनाव लड़ने से पाला तक नहीं पड़ा। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की यह रणनीति दिल्ली के प्रदेश नेताओं और कार्यकर्ताओं को रास नहीं आ रही है।
कांटे के मुकाबले के इस चुनाव में भाजपा ने अपने मार्गदर्शक मंडल के नेताओं आडवाणी, जोशी को तो भुला ही दिया, साथ ही राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी जैसे नेताओं को भी पूछा नहीं जा रहा। आडवाणी का दिल्ली के प्रबुद्ध वर्ग पर असर माना जाता है, परंतु पार्टी ने उनकी कोई सभा नहीं कराई है।
राजनाथ और गडकरी की भी पूछ घटी
यही आलम जोशी का भी है। उत्तर प्रदेश मूल के ब्राह्मण मतदाताओं के अलावा पर्वतीय मतदाताओं पर भी उनकी पकड़ मानी जाती है। पार्टी अपने शासन वाले राज्यों के सुशासन को भुनाने का प्रयास कर रही है लेकिन इन राज्यों के मुख्यमंत्री दिल्ली के चुनावी जंग से दूर हैं।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान महज एक कार्यक्रम में शिरकत कर विदेश रवाना हो गए। छत्तीसगढ़ के सीएम रमन सिंह और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को पार्टी ने अब तक प्रचार अभियान में नहीं उतारा है।
झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को पीएम मोदी ने रामलीला मैदान में गरीब चेहरे के रूप में दिखाया था। मगर वह भी प्रचार के लिए अभी तक नहीं आए। यही आलम महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का भी है।
रणनीति से लेकर प्रचार की संभालने में जुटे जेटली के करीबी नेता
दिल्ली चुनाव की पूरी कमान अमित शाह और वित्त मंत्री अरुण जेटली के हाथों में है। जेटली के करीबी माने जाने वाले जेपी नड्डा, धर्मेंद्र प्रधान, निर्मला सीतारमण और पीयूष गोयल भी रणनीति में शामिल हैं।
दिल्ली के मतदाताओं पर प्रभाव रखने वाले कई मंत्री और नेता चुनावी परिदृश्य से ओझल हैं। जीताऊ रणनीतिकार उत्तर प्रदेश के प्रभारी ओम माथुर को पार्टी ने अब तक मैदान में उतारा ही नहीं है।
वरुण गांधी दिल्ली में होते हुए भी प्रचार से दूर हैं। वहीं उत्तराखंड के मतदाताओं पर पकड़ रखने वाले पूर्व मंत्री बीसी खंडूरी, भगत सिंह कोश्यारी अब तक नहीं दिखे हैं। हिमाचल के शांता कुमार की भी पार्टी को याद नहीं रही।