कोरोना महामारी के इस दौर में महात्मा गांधी की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। कोविड-19 के कारण आज समाज में जिस तरह का भययुक्त माहौल है, गांधीजी बिल्कुल इसके खिलाफ होते। वह कोविड-19 से लोगों को भय मुक्त रहने की सलाह देते। वह पहले अपनी व अपने साथ सेवा भाव में जुटे लोगों की रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने पर जोर देते। इसके बाद स्वयं रोगियों की प्रत्यक्ष रूप से सेवा करते। क्योंकि गांधीजी मानव सेवा को ही सबसे बड़ा धर्म मानते थे। गांधीजी की 150वीं जयंती के मौके पर मौजूदा दौर की सबसे बड़ी गांधीवादी विचारक राधा भट्ट ने यह बातें कहीं।
राधा भट्ट गांधी जी की परम शिष्या सरला बहन के साथ वर्षों तक जन सेवा कार्यों में संलग्न रहीं। उस दौरान विनोबा के भूदान आंदोलन के लिए उन्होंने एक दिन में 36 किलोमीटर की पदयात्रा की। गांधी शांति प्रतिष्ठान की वे अध्यक्ष हैं, लक्ष्मी आश्रम को उनका मार्गदर्शन आज भी मिल रहा है। हिमालय सेवा संघ, कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट इंदौर, हिमवंती (नेपाल), केन्द्रीय गांधी स्मारक निधि, नई दिल्ली जैसी संस्थाओं में उनकी सक्रियता बनी हुई है।
उन्होंने गांधीजी की अफ्रीका यात्रा के दौरान हैजा फैलने का एक वाकया सुनाया। उन्होंने बताया कि गांधीजी ने उस दौरान निर्भय होकर लोगों की सक्रिय रूप से सेवा की। उन्होंने कहा कि मौजूदा महामारी के दौर में कोरोना से ज्यादा तो लोगों को भय खाए जा रहा है। इसलिए गांधी जी का बताया स्वच्छता के साथ निर्भय रहने का मार्ग इस समय दुनिया को बचा सकता है। गांधी जी ने प्राचुर्य शास्त्री की सेवा स्वयं की, जबकि वह कुष्ठ रोग से ग्रसित थे।
100 साल बाद भी गांधीजी का सिद्धांत प्रासंगिक : दीपंकर श्रीज्ञान
गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के निदेशक दीपंकर श्रीज्ञान ने बताया कि 100 साल पहले वर्ष 1920 में देश के अंदर स्पेनिश फ्लू फैला था। उस दौरान गांधी जी के बताए स्वच्छता और सामाजिक दूरी के साथ सेवा भाव के रास्ते पर चलकर देश ने इस बीमारी से पार पाया था। आज लगभग 100 साल बाद गांधीजी के उसी सिद्धांत की जरूरत है।
गांधीजी छुआछूत का अनुभव नहीं होने देते : लक्ष्मी दास
हरिजन सेवक संघ के सचिव रहे वरिष्ठ गांधीवादी विचारक लक्ष्मी दास ने कोरोना महामारी के दौर में गांधीजी को याद किया। उन्होंने कहा गांधीजी होते तो कोरोना के मरीजों को छुआछूत और अलग-थलग रखने का अनुभव वह नहीं होने देते। उल्टा मरीजों की तीमारदारी वह स्वयं करते। ऐसा उनके दौरान फैले प्लेग बीमारी के अनुभवों को देखते हुए कह सकते हैं।
गांधीजी देसी आयुर्वेद के माध्यम से इलाज पर जोर देते : प्रो. विपिन कुमार त्रिपाठी
आईआईटी दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर वरिष्ठ गांधीवादी विचारक प्रो. विपिन कुमार त्रिपाठी ने कहा कि गांधीजी देसी नीम हकीम चिकित्सा पर जोर देते। वह कभी काम-धंधे, स्कूल बंद नहीं करते। उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहे बिना सही तरीके से कार्य नहीं होता इसलिए गांधी जी होते तो मास्क लगाकर सामाजिक दूरी का पालन करते हुए लोगों को काम करने की सलाह देते। उन्होंने बताया कि अंग्रेजी हुकूमत के दौरान महाराष्ट्र की धूलिया जेल में बंद बालकोवा भावे को टीवी की बीमारी लग जाने पर गांधीजी ने उन्हें नीम की पती खाने की सलाह दी थी। बालकोवा ने गांधी जी के बताए नुस्खे का अनुसरण किया और जेल में रहते ही उनकी टीवी ठीक हो गई।