पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मदन लाल खुराना
- नब्बे के दशक में ‘दिल्ली का शेर’ कहे जाने वाले खुराना ने दिल्ली में भाजपा को खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
- 20 अगस्त 2005 को उन्हें अनुशासनहीनता के कारण पार्टी से निकाल दिया गया था। खुराना अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री भी रहे थे।
- वर्ष 2004 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से खुद को अलग कर लिया था, लेकिन कुछ साल बाद राजनीति में फिर वापसी की थी। वह आरएसएस के भी सक्रिय सदस्य थे।
- दो महीने पहले ही खुराना के बड़े बेटे विमल खुराना का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था, वह 55 वर्ष के थे।
- 1947 में देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार भारत आ गया था। तब खुराना मात्र 12 साल के थे। उनका परिवार दिल्ली के कीर्ति नगर के रिफ्यूजी कॉलोनी में रहता था।
एक दशक तक खाली रहा बंगला...
साल 1993 में दिल्ली विधानसभा के नए सिरे से गठन और भाजपा की हुकूमत कायम होने के बाद पहले मुख्यमंत्री बने मदनलाल खुराना दिल्ली के शामनाथ मार्ग पर स्थित 33 नंबर बंगले मेें रहने आए। खुराना के हटने के बाद इस बंगले में कोई भी जाने को तैयार नहीं हुआ, लेकिन कांग्रेस राज में दिल्ली सरकार के मंत्री दीपचंद बंधु को यह बंगला आवंटित किया गया। वे यहां रह रहे थे तभी बीमार हुए और बीमारी से ही उनकी मौत हो गई। उनकी मौत के बाद दिल्ली सरकार के किसी मंत्री या अधिकारी ने इस बंगले में रहना तो दूर झांकना भी गवारा नहीं समझा। इसका असर यह हुआ कि शामनाथ मार्ग का 33 नंबर का यह बंगला 2003 से 2013 के बीच करीब एक दशक तक खाली रहा। इसके बाद आम आदमी पार्टी की सरकार में अरविंद केजरीवाल के करीबी दिल्ली डायलॉग कमीशन के उपाध्यक्ष आशीष खेतान 2015 में रहने आए। ये भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए।
ताकतवर मुख्यमंत्री थे खुराना
भाजपा नेता व पूर्व विधायक रामवीर सिंह बिधूड़ी बताते हैं कि खुराना बेहद ताकतवर मुख्यमंत्री थे। पार्टी में उनकी जबरदस्त धाक थी और उनके पद से हटने की कोई गुंजाइश नहीं थी, लेकिन अचानक हवाला डायरी का मामला सामने आया और उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ मदन लाल खुराना