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खास खबरः दिल्ली में बढ़ रहे हैं फेफड़ों के कैंसर के मरीज, प्रदूषण है कारण

Wed, 11 Nov 2020 04:55 AM IST
दुष्यंत शर्मा अभिषेक पांचाल, नई दिल्ली
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Lung Cancer - फोटो : अमर उजाला
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राजधानी में हर साल सर्दी में प्रदूषण गंभीर स्तर पर पहुंच जाता है। इसके चलते लोगों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। बढ़ते प्रदूषण के कारण फेफड़ों के कैंसर के मामले भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि कोरोनो काल में यह समस्या और भी विकराल रूप ले सकती है।

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रोहिणी स्थित राजीव गांधी कैंसर अस्पताल के डॉ. विनीत तलवार ने कहा कि वायु प्रदूषण से फेफड़े के कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि पिछले तीन साल से अस्पताल में ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ रही है, जो फेफड़ों के कैंसर से ग्रसित हैं। आजकल इलाज के लिए जो मरीज आ रहे हैं, उनमें भी फेफड़ों की समस्या से ग्रस्त लोगों की संख्या अधिक है। इसका प्रमुख कारण प्रदूषण है। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में यह और भी घातक साबित हो सकता है, क्योंकि प्रदूषण और कोरोना दोनों ही फेफड़ों को असर करते हैं। ऐसे में जिन व्यक्तियों को संक्रमण हुआ है यदि उन्हें कैंसर भी हो जाए तो यह जानलेवा साबित होता है।

राजीव गांधी कैंसर अस्पताल के सीनियर कंसलटेंट डॉ. एलएम डारलॉन्ग ने कहा कि प्रदूषण के बढ़ते स्तर ने फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ा दिया है। दुर्भाग्य से ज्यादातर मरीजों का पता एडवांस स्टेज में चलता है। यही कारण है कि कैंसर के कारण होने वाली मौतों में फेफड्ऱों के कैंसर की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। हाल के दिनों में जो लोग कैंसर से ग्रसित हुए हैं, उनमें फेफड़ों के कैंसर के मरीजों की संख्या सबसे अधिक है। इससे जान गंवाने वालों की संख्या स्तन, प्रोस्टेट और कोलन कैंसर से जान गंवाने वालों की कुल संख्या से भी ज्यादा है। उन्होंने कहा कि इस साल अब तक ऐसे 50 से अधिक मरीज आए हैं, जिन्हें फेफड़ों में कैंसर हो गया है।
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ज्यादा खांसी होना कोरोना नहीं, कैंसर के हो सकते हैं लक्षण
डॉ. विनीत तलवार ने कहा कि आजकल लोगों को खांसी होती है तो वह इसे कोरोना से जोड़कर देखने लगते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। यह कैंसर का भी कारण हो सकता है, इसलिए अगर खांसी की समस्या 3-4 हफ्ते तक ठीक नहीं हो तो जांच करा लेनी चाहिए। अगर हम शुरुआती स्टेज में कैंसर का पता लगा लेते हैं तो बचने की उम्मीद बहुत ज्यादा हो जाती है। फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित पांच में एक रोगी की पुष्टि होने के एक महीने में ही मृत्यु हो जाती है, जबकि 73 प्रतिशत रोगी साल भर के अंदर दम तोड़ देते हैं।

ये हैं कारण
दिल्ली कैंसर स्टेट इंस्टीट्यूट के डॉ. विनय तायल ने कहा कि डॉक्टरों का मानना है कि सांस लेते समय प्रदूषण के जो कण शरीर में जाते हैं, वह फेफड़ों तक जाने वाली कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर फेफड़ों के कैंसर का कारण बनते हैं। अगर गले में खराश हो, बुखार हो, कहीं गांठ बन रही हो, रक्तस्राव होने लगे या पेट में कोई समस्या लग रही हो, जिसका इलाज नहीं हो पा रहा हो, तो पर्याप्त जांच बहुत जरूरी है।
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ये हैं लक्षण

  • खून की खांसी, थोड़ी मात्रा में भी
  • सांसों की कमी
  • छाती में दर्द
  • आवाज बैठना
  • बिना कोशिश किए वजन कम करना
  • सरदर्द
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