दिल्ली में आप-कांग्रेस गठबंधन रहा नाकाम
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राजधानी में सत्तारूढ़ दल के खिलाफ किया गया गठबंधन पहली बार असफल हुआ है। इस बार गठबंधन का खाता भी नहीं खुला। इस तरह इंडिया गठबंधन की प्रमुख कांग्रेस व आम आदमी पार्टी का भाजपा को हराने का सपना चूर-चूर हो गया। जबकि पहली बार 47 साल व दूसरी बार 25 साल पहले बने गठबंधन ने सत्तारूढ़ दल को हराने में कामयाबी हासिल की थी। माना जा रहा था कि इस बार भी गठबंधन भाजपा का हरा देगा। वर्ष 2014 के चुनाव में कांग्रेस व आम आदमी पार्टी को भाजपा से अधिक मत मिले थे। लिहाजा उस दौरान उनके गठबंधन करके चुनाव लड़ने की स्थिति में उनकी सात में से छह सीटों पर जीत तय मानी जा रही थी। हालांकि इस बार की तरह वर्ष 2019 में भाजपा काफी मजबूत स्थिति में थी।
भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस व आम आदमी पार्टी ने गठबंधन तो कर लिया था, लेकिन चुनाव के दौरान उनमें एकजुटता नहीं दिखी। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की दो सभाओं व एक संवाद कार्यक्रम में आम आदमी पार्टी के बड़े नेता मौजूद नहीं थे, वहीं आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के रोड शो व सभाओं में कांग्रेस के बड़े नेता नहीं दिखे। इसके अलावा उन्होंने पंजाब में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा। वहीं उनके प्रदेश स्तर के नेताओं ने एक साथ कुछ ही सभाओं को संबोधित किया। इतना ही नहीं, चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस व आम आदमी पार्टी के नेताओं ने एक-दूसरे दल के घोषणा पत्र की चर्चा करना भी मुनासिब नहीं समझा। इस तरह उनका गठबंधन जनता का दिल नहीं जीत सका।
1977 में गठबंधन ने किया था कांग्रेस का सूपड़ा साफ
राजधानी में वर्ष 1977 में केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी दलों ने पहली बार गठबंधन किया था। उस दौरान जनसंघ (अब भाजपा) ने भारतीय लोकदल आदि दलों ने जनता पार्टी बनाई थी और उन्होंने एक चुनाव चिन्ह व एक घोषणा पत्र पर चुनाव लड़ा था और उन्होंने कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था। उस चुनाव में राजधानी की सातों सीटों पर कांग्रेस हार गई थी। इतना ही नहीं, कांग्रेस को पहली बार क्लीन स्वीप का भी सामना करना पड़ा था।
1989 में भी गठबंधन ने हराया सत्ताधारी दल
राजधानी में दूसरी बार 1989 में गठबंधन किया गया था। उस दौरान भी पहली बार की तरह विपक्षी दलों ने कांग्रेस के खिलाफ गठबंधन किया। तब भाजपा व जनता दल ने मिलकर चुनाव लड़ा था। भाजपा ने पांच सीट व जनता दल ने दो सीट ली थी और भाजपा ने चार व जनता दल ने एक सीट पर जीत हासिल की थी। इस तरह पांच साल पहले सातों सीटें जीतने वाली कांग्रेस मात्र दो सीट ही जीत सकी थी। गठबंधन ने पहली बार की तरह दूसरी बार भी कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने का कार्य किया था।