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LS Elections: कन्हैया को जीत के लिए तोड़ने होंगे कई चक्रव्यूह, उत्तर-पूर्वी दिल्ली में आसान नहीं सियासी संतुलन

नवनीत शरण, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 21 Apr 2024 05:14 AM IST

सार

वे एक सप्ताह बाद भी प्रचार करने के लिए नहीं उतर सके हैं। आलम यह है कि शुक्रवार को प्रदेश स्तर पर बुलाई गई परिचय बैठक में उनकी दूसरे वरिष्ठ नेताओं से कहासुनी भी हो गई। माना जा रहा है कि आने वाले समय में उन्हें एक साथ कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
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कन्हैया कुमार, मनोज तिवारी। - फोटो : Amar Ujala

उत्तर-पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट से कन्हैया कुमार को कांग्रेस आलाकमान ने चुनावी मैदान में तो उतार दिया है, लेकिन वह अपनी पार्टी के चक्रव्यूह में उलझते नजर आ रहे हैं। वे एक सप्ताह बाद भी प्रचार करने के लिए नहीं उतर सके हैं। आलम यह है कि शुक्रवार को प्रदेश स्तर पर बुलाई गई परिचय बैठक में उनकी दूसरे वरिष्ठ नेताओं से कहासुनी भी हो गई। माना जा रहा है कि आने वाले समय में उन्हें एक साथ कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

राजनीति के जानकारों का कहना है कि कन्हैया कुमार को कई चक्रव्यूह तोड़ने होंगे। सबसे पहले तो उन्हें अपनी ही पार्टी की रणनीति के जाल से बाहर निकलने की चुनौती होगी। साथ ही, गठबंधन के तहत चुनावी मैदान में होने से आम आदमी पार्टी का भी समर्थन जुटाना होगा। इतना ही नहीं, जेएनयू में बनी छवि से भी बाहर निकलना होगा। इस बाधा के पार करने के बाद दो बार से सांसद चुने गए सांसद मनोज तिवारी चुनौती होंगे। फिर उन्हें बाहरी उम्मीदवार होने का भी खामियाजा उठाना होगा और वोटरों के बीच पहुंचकर आश्वासन देना होगा कि वह गठबंधन के तहत चुनावी मैदान में उतरे हैं। अल्पसंख्यक और दलितों को भी साधना होगा।



कई बाधाएं सामने
कन्हैया को जीत हासिल करने के लिए कई बाधाओं को पार करना होगा। हाल ही में प्रदेश कांग्रेस की बैठक में ही आलाकमान के फैसले से पार्टी में नाखुशी स्पष्ट रूप से देखने को मिली। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस कार्यकर्ता किस तरह से उनके प्रचार में जुटते हैं, यह देखने वाली बात होगी। भाजपा सांसद मनोज तिवारी की पूर्वांचली वोटरों में गहरी पैठ है।

लिहाजा, उन्हें उस फ्रंट पर भी लड़ना होगा। यहां पिछले चुनाव में कांग्र्रेस की दिग्गज नेता शीला दीक्षित को भी बड़े अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दिल्ली विश्वविद्यालय का कलेवर है और एबीवीपी की खास पैठ है। ऐसे में उन्हें एनएसयूआई से तालमेल बिठाना होगा। अल्पसंख्यकों को अपने पक्ष में करने के लिए बहुसंख्यक समाज के बिदकने का भी खतरा रहेगा।

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कन्हैया कुमार, मनोज तिवारी। - फोटो : Amar Ujala
उत्तर-पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट से कन्हैया कुमार को कांग्रेस आलाकमान ने चुनावी मैदान में तो उतार दिया है, लेकिन वह अपनी पार्टी के चक्रव्यूह में उलझते नजर आ रहे हैं। वे एक सप्ताह बाद भी प्रचार करने के लिए नहीं उतर सके हैं। आलम यह है कि शुक्रवार को प्रदेश स्तर पर बुलाई गई परिचय बैठक में उनकी दूसरे वरिष्ठ नेताओं से कहासुनी भी हो गई। माना जा रहा है कि आने वाले समय में उन्हें एक साथ कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

राजनीति के जानकारों का कहना है कि कन्हैया कुमार को कई चक्रव्यूह तोड़ने होंगे। सबसे पहले तो उन्हें अपनी ही पार्टी की रणनीति के जाल से बाहर निकलने की चुनौती होगी। साथ ही, गठबंधन के तहत चुनावी मैदान में होने से आम आदमी पार्टी का भी समर्थन जुटाना होगा। इतना ही नहीं, जेएनयू में बनी छवि से भी बाहर निकलना होगा। इस बाधा के पार करने के बाद दो बार से सांसद चुने गए सांसद मनोज तिवारी चुनौती होंगे। फिर उन्हें बाहरी उम्मीदवार होने का भी खामियाजा उठाना होगा और वोटरों के बीच पहुंचकर आश्वासन देना होगा कि वह गठबंधन के तहत चुनावी मैदान में उतरे हैं। अल्पसंख्यक और दलितों को भी साधना होगा।

कई बाधाएं सामने
कन्हैया को जीत हासिल करने के लिए कई बाधाओं को पार करना होगा। हाल ही में प्रदेश कांग्रेस की बैठक में ही आलाकमान के फैसले से पार्टी में नाखुशी स्पष्ट रूप से देखने को मिली। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस कार्यकर्ता किस तरह से उनके प्रचार में जुटते हैं, यह देखने वाली बात होगी। भाजपा सांसद मनोज तिवारी की पूर्वांचली वोटरों में गहरी पैठ है।

लिहाजा, उन्हें उस फ्रंट पर भी लड़ना होगा। यहां पिछले चुनाव में कांग्र्रेस की दिग्गज नेता शीला दीक्षित को भी बड़े अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दिल्ली विश्वविद्यालय का कलेवर है और एबीवीपी की खास पैठ है। ऐसे में उन्हें एनएसयूआई से तालमेल बिठाना होगा। अल्पसंख्यकों को अपने पक्ष में करने के लिए बहुसंख्यक समाज के बिदकने का भी खतरा रहेगा।
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