मतदान समाप्ति के बाद शिक्षकों को भी कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ा। चुनाव आयोग की अनदेखी और ध्वस्त व्यवस्थाओं के चलते वह रातभर सड़कों पर भटकने को मजबूर हो गए। बेबसी का आलम यह रहा कि वह 22 घंटे ड्यूटी के बाद भूखे-प्यासे अपने घरों तक पहुंचे। कई बीमार हो गए। कई का स्वास्थ्य गिर रहा है। बावजूद, सरकारी प्रवाह में होने के कारण वह अव्यवस्थाओं पर बोल तक नहीं पा रहे हैं।
दिल्ली में इस बार जहां उम्मीद से कम मतदान हुआ। वहीं, चुनाव आयोग की व्यवस्थाओं को लेकर ड्यूटी पर रहे शिक्षक नाराज हैं। सुबह करीब साढ़े तीन बजे से ड्यूटी पर रहने के बाद आधी रात को ये लोग भूख-प्यास से तड़प उठे। भोजन तो दूर, पेयजल तक नहीं मिला। पहचान छिपाने की शर्त पर एक शिक्षिका ने बताया कि शहरी इलाकों के बजाय उत्तर पश्चिम क्षेत्र में अधिक तकलीफ हुईं। 10 मई को थैला ले जाने के लिए उन्हें बुलाया गया था, लेकिन जब थैले मिले तो थोड़ी देर में वापस ले लिए गए। 11 मई को फिर से थैला लेकर जाने को कहा गया। इसके बाद मतदान के दिन यानि 12 मई की सुबह साढ़े तीन बजे उन्हें ड्यूटी पर बुलाया, जबकि ईवीएम मशीन की जिम्मेदारी उन्हें साढ़े चार बजे दी गई। ईवीएम जाम कराकर रात्रि 12 बजे खाली हुए। महिलाओं को भी घर तक भेजने की व्यवस्था तक नहीं थी।
वोटिंग कक्ष तक नहीं पहुंचाया पेयजल
शिक्षिका के मुताबिक, मतदान के दौरान सभी ड्यूटी कर्मचारियों को वोटिंग रूम में ही रहना पड़ता है। मतदान केंद्र पर पेयजल की व्यवस्था तो थी, परंतु कोई कर्मचारी बाहर जाकर पानी नहीं पी सकता था। ऐसे में वोटिंग रूम में कर्मचारियों को पानी उपलब्ध कराने के लिए कोई नहीं था। इसके बाद रात को ईवीएम जमा कराने में भी दो से तीन घंटे मशक्कत करनी पड़ी। रात करीब 12 बजे जब वे स्ट्रांग रूम में ईवीएम जमा करके बाहर निकलीं तो उन्हें घर छोड़ने के लिए भी कोई सुविधा नहीं थी। रात करीब ढाई बजे वह घर पहुंचीं, जिसके चलते सोमवार को उनका स्वास्थ्य खराब हो गया। ठीक ऐसा ही हाल पश्चिमी दिल्ली क्षेत्र के मतदान केंद्रों पर ड्यूटी देने वाले शिक्षकों का रहा।