राजधानी के मतदाताओं में भाजपा-कांग्रेस को छोड़ अन्य कोई राजनीतिक पार्टी पैठ अभी तक नहीं बना सकी है। सभी चुनाव में अन्य राजनीतिक दलों को दिल्ली की जनता नकारती रही है। यहां तक की चुनाव चिह्न भी बदले जैसे कांग्रेस चार लोकसभा चुनाव दो बैलों का जोड़ा चुनाव चिन्ह पर लड़ी उसके बाद दो लोकसभा चुनाव गाय-बछड़ा चुनाव चिह्न पर फिर 1980 के चुनाव में हाथ छाप पर लेकिन इसी पार्टी के उम्मीदवार जीत दर्ज करते रहे। इसी तरह जनसंघ पांच लोकसभा चुनाव दीया चुनाव चिन्ह पर लड़ी और भाजपा में विलय के बाद कमल चुनाव पर लड़ी लेकिन प्रत्याशी इन्हीं पार्टियों के जीतते रहे।
इसी तरह वक्त के साथ कांग्रेस और जनसंघ के चुनाव चिन्ह तो जरूर बदले पार्टियों में टूट-फूट भी हुई लेकिन मतदाताओं का प्रेम भाजपा पूर्व में जनसंघ-कांग्रेस को छोड़ दूसरे पार्टियों के तरफ कम ही गया। 1977 के चुनाव में भारतीय लोक दल के प्रत्याशियों ने दिल्ली की सातों सीट पर विजय हासिल की, लेकिन इनमें ज्यादातर जनसंघ के ही चेहरे थे। जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी, विजय कुमार मल्होत्रा, सिकंदर बख्त, किशोरी लाल, ब्रह्म प्रकाश जैसे नेता शामिल थे। इसी तरह वीपी सिंह के नेतृत्व में जनता दल से 1998 में एक ही उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी। इस चुनाव में बाहरी दिल्ली संसदीय क्षेत्र के तारिफ सिंह सांसद चुने गए थे।