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‘साहित्य और पत्रकारिता में बनाना होगा सामंजस्य’

Fri, 23 Aug 2019 06:00 PM IST
पूजा त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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साहित्य और पत्रकारिता - फोटो : अमर उजाला
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महात्मा गांधी भारत में पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पत्रकारिता की ताकत को पहचाना और उसका इस्तेमाल किया। यह कहना था माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र का।

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मौका था साहित्य अकादमी द्वारा ‘साहित्य और पत्रकारिता’ पर आयोजित एकदिवसीय परिचर्चा का। मिश्र ने कहा कि एक समय था जब पत्रकारिता और साहित्य एक दूसरे को ताकत देते थे और संस्कारित भी करते थे। लेकिन आज स्थितियां बदल चुकी हैं।

प्रतिष्ठित राष्ट्रीय हिंदी दैनिक अमर उजाला के संपादक उदय सिन्हा ने इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि पहले की पत्रकारिता के आइने में आज की पत्रकारिता को देखना सही नहीं होगा।

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समाज बदल गया है, इसलिए पत्रकारिता भी बदली है। हमें साहित्य और पत्रकारिता में एक सामंजस्य बनाना होगा। साहित्य को पत्रकारिता में संस्कार भरने का काम करना चाहिए और पत्रकारिता को साहित्य को लोकप्रिय बनाने में योगदान देना चाहिए।

प्रेमचंद्र साहित्य के विशेषज्ञ और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्राध्यापक कमल किशोर गोयनका ने विभिन्न विचारधाराओं के साहित्य और पत्रकारिता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि साहित्य और पत्रकारिता का लक्ष्य देशहित होना चाहिए।

पत्रकारिता के प्राध्यापक और साहित्य अकादमी के हिंदी परामर्श मंडल के सदस्य प्रो. अरुण भगत ने कहा कि पत्रकारिता और साहित्य एक सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों के लिए तथ्य और तत्व की जरूरत होती है, जो समाज से ही प्राप्त होते हैं।

परिचर्चा में तीन सत्र थे, जिनमें महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के प्रतिकुलपति अनिल कुमार राय, हिंदुस्तानी एकेडमी के अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह, प्राध्यापक एवं मीडिया विश्लेषक कुमुद शर्मा और अवनिजेश अवस्थी सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए। 

साहित्य शाश्वत सत्य को समर्पित :  अच्युतानंद मिश्र

साहित्य शाश्वत सत्य को समर्पित होता है। साहित्य मनुष्य का निर्माण ही नहीं, समाज कोआगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आज पत्रकारिता साहित्य से अधिक लोकप्रिय है।

पहले राजनेता और साहित्यकार पत्रकारिता के माध्यम से राजनीति की लड़ाई लड़ते थे। उनकी पत्रकारिता में राजनीति नहीं होती थी। उन दोनों का लक्ष्य देश की आजादी और स्वतंत्र राष्ट्र का निर्माण था। वह नैतिकता और साहस का समय था। पत्रकार व माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता व संचार विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने बृहस्पतिवार को यह बात साहित्य और पत्रकारिता विषय पर आयोजित संवाद में कही। 

दिल्ली में साहित्य अकादमी में आयोजित साहित्य व पत्रकारिता संवाद में समालोचक व केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष कमल किशोर गोयनका ने कहा कि साहित्य ने पत्रकारिता को हमेशा नैतिकता का बल दिया है । विभिन्न विचारधाराओं के साहित्य और पत्रकारिता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे समय में हमारी वैचारिक प्रतिबद्धता देशहित के लिए होनी चाहिए। 
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वरिष्ठ पत्रकार उदय कुमार ने साहित्य और पत्रकारिता के अंतर को समझाया। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता ने साहित्य का पोषण किया है। पत्रकारिता को साहित्य संस्कारित करता है और साहित्य को पत्रकारिता प्रतिष्ठित करती है। साहित्य ने पत्रकारिता की भाषा को सुधारा है। पत्रकारिता को अगर अपने पुराने संस्कारों को पाना है तो उसे साहित्य का पोषण करना ही होगा।

साहित्य हमेशा पत्रकारिता को समाज के प्रति हितकारी और संवेदनशील बनाता है। लोकहित के लिए पत्रकारिता और साहित्य को मिलकर काम करना होगा। परिसंवाद के प्रथम सत्र की अध्यक्षता हिंदुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष व साहित्यकार उदय प्रताप सिंह ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में  कहा कि पत्रकारिता और साहित्य को कभी अलग नहीं किया जा सकता। क्योंकि दोनों एक दूसरे को अनुशासित करते रहे हैं। वर्तमान में दोनों के बीच तालमेल न होने के कारण ये दोनों ही अपने लक्ष्य से भटक गए हैं और समाज को कुछ भी नहीं दे पा रहे हैं। 

सत्र के अध्यक्ष व महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति अनिल कुमार राय ने कहा कि वर्तमान में साहित्य और पत्रकारिता के स्वरूप और उद्देश्य दोनों बदल गए हैं और साहित्य तो छोड़िए सजग पत्रकारिता को भी साँस लेने में मुश्किल हो रही है। हमें वर्तमान में साहित्य और पत्रकारिता के नए मानदंड बनाने होंगे। 

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की प्रोफेसर एवं मीडिया विश्लेषक कुमुद शर्मा ने कहा कि समय के साथ दोनों विधाओं ने अपनी समृद्ध परंपराओं को छोड़ दिया है। आज बाजार के आधार पर खबरें तय होती है। उन्होंने वर्तमान साहित्य को भी कटघरे में खड़े करते हुए कहा कि साहित्यकारों को सोचना चाहिए कि वे क्या रच रहे हैं और कितना पठनीय है। 

इससे पहले उद्घाटन सत्र का संचालन हिंदी संपादक अनुपम तिवारी ने किया। जबकि परिसंवाद के प्रथम सत्र की अध्यक्षता हिंदुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह ने की और अवनिजेश अवस्थी ने अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए। परिसंवाद के अंतिम सत्र की अध्यक्षता अनिल कुमार राय ने की। जबकि अशोक कुमार ज्योति,जीतेंद्र वीर कालरा, किरण चोपड़ा ने अपने वक्तव्य दिए। कार्यक्रम में विभिन्न विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता और साहित्य विभागों से आए प्राध्यापक, शोधार्थी, विद्यार्थी, साहित्यकार व पत्रकार भी मौजूद रहे। कार्यक्रम के अंत में अरुण कुमार भगत ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
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