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शराब नीति विवाद: सियासी भूचाल से हिल गई थी आप की बुनियाद, साख पर लगा दाग; राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को झटका

Sat, 28 Feb 2026 02:55 AM IST
दुष्यंत शर्मा विनोद डबास, नई दिल्ली

सार

इस प्रकरण ने सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी व उसके प्रमुख अरविंद केजरीवाल को कठघरे में खड़ा कर दिया।
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आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल - फोटो : ANI Photo
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विस्तार
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वर्ष 2022 के बाद दिल्ली की राजनीति में अगर किसी मुद्दे ने सबसे बड़ा भूचाल खड़ा किया, तो वह शराब नीति विवाद था। इस प्रकरण ने सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी व उसके प्रमुख अरविंद केजरीवाल को कठघरे में खड़ा कर दिया। जिस कट्टर ईमानदार ब्रांडिंग के सहारे पार्टी ने राजधानी की सत्ता तक का सफर तय किया, उसी दावे को विपक्ष ने शराब नीति मामले में सबसे बड़े सवाल में बदल दिया था और वह सत्ता से बाहर हो गई थी।

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आम आदमी पार्टी पर जब भ्रष्टाचार में डूबने के आरोप लगे, तो राजनीतिक समीकरण तेजी से बदला। जांच एजेंसियों की सक्रियता और शीर्ष नेतृत्व के कानूनी संकट में घिरने से विपक्ष को आक्रामक अभियान का अवसर मिला। भाजपा और कांग्रेस ने इसे ईमानदारी के मॉडल की विफलता बताकर जनता के बीच जोरदार तरीके से उठाया। परिणामस्वरूप, पार्टी की साख और संगठन पर भी इसका असर पड़ा।

सत्ता से साख तक, दोहरी मार
दिल्ली की सत्ता पर काबिज रहने वाली पार्टी को इस विवाद ने रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया। शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली-पानी सब्सिडी जैसे मुद्दों पर जो आक्रामक प्रचार पहले उसकी ताकत थी, वह धीरे-धीरे पीछे छूटते गए। पार्टी का बड़ा हिस्सा कानूनी लड़ाइयों और राजनीतिक बचाव में उलझ गया, जिससे प्रशासनिक गति और संदेश प्रभावित हुए। पार्टी नेतृत्व के कानूनी संकट ने संगठनात्मक समन्वय पर भी असर डाला।
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मध्यमवर्गीय भरोसे में दरार
दिल्ली की राजनीति में शहरी मध्यमवर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है। यही वर्ग सरकारी स्कूलों के सुधार, मोहल्ला क्लीनिक मॉडल और सस्ती बिजली-पानी योजनाओं का समर्थक रहा था। शराब नीति विवाद ने इसी वर्ग के भीतर नैतिकता और पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े कर दिए। शिक्षित मतदाता, जो ईमानदारी की छवि से प्रभावित थे, उनके बीच असहजता दिखने लगी। विपक्ष ने इसे नैतिक गिरावट का प्रतीक बताकर प्रचारित किया, जिससे वर्षों में गढ़ी गई साख को गहरी चोट पहुंची।

विपक्ष को मिला सशक्त हथियार
भाजपा और कांग्रेस ने शराब नीति को चुनावी मुद्दे के रूप में पूरी ताकत से इस्तेमाल किया। विधानसभा चुनाव के दौरान हर रैली और बहस में यह प्रकरण केंद्र में रहा। भ्रष्टाचार बनाम सुशासन की बहस ने विकास और कल्याण योजनाओं को पीछे धकेल दिया। इस मुद्दे ने विपक्ष को वह नैतिक हथियार दिया, जिसकी उसे लंबे समय से तलाश थी। परिणामस्वरूप, दिल्ली की सत्ता से भी हाथ धोना पड़ा।

राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा पर विराम
पंजाब में सरकार बनाने के बाद पार्टी ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका विस्तार देने का अभियान तेज किया था। गुजरात, गोवा और अन्य राज्यों में संगठन को मजबूत करने और अन्य राज्यों में संगठन खड़ा करने की कोशिशें जारी थीं। शराब नीति विवाद ने इस विस्तार की रफ्तार तोड़ दी। नए राज्यों में पार्टी को विकास मॉडल के बजाय आरोपों से जुड़े सवालों का सामना करना पड़ा।

 

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