उनके घरों में आटा नहीं है। बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा दिलाने के लिए जेब में फूटी कौड़ी नहीं है। रोजगार भी कोरोना वायरस लील चुका है। भविष्य से उन्हें उम्मीद तो है, लेकिन वह कब पूरी होगी, इसका अंदाजा नहीं। अब स्टेशनों पर कुछ ट्रेनें तो आती हैं, लेकिन यात्री उनसे बचने लगे हैं। वजह है, कहीं संक्रमण न लग जाए।
यह पीड़ा है उन मेहनतकश कुलियों की, जिनके संघर्ष को साल 1983 में आई महानायक अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘कुली’ में बखूबी दिखाया गया। कोरोना ने कुलियों की जिंदगी बे-पटरी कर दी है और आर्थिक स्थिति खराब होने से वह बेहाल हैं।
राजधानी में लगभग 2800 कुली हैं। इनमें से 1250 कुली नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर काम करते थे। 24 मार्च को ट्रेनें बंद होने के कारण इनका काम भी बंद हो गया। अब कुछ ट्रेनें चली तो हैं, लेकिन लोग इनसे बचकर निकल जाते हैं। फिलहाल यहां 500 के आसपास कुली रह गए हैं। बेरोजगार होने के कारण कोई अपने गांव चला गया है तो कोई इधर-उधर मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का पेट भर रहा है।
मकान का किराया क्या, रोटी भी मिलना मुश्किल
राजस्थान से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर 10 साल पहले समय सिंह मीणा काम की तलाश में आए थे। यहां उन्हें कुली का काम मिल गया और हर दिन 1200 से 1500 रुपये कमाने लगे। कमाई का जरिया मिलने के बाद वह अपने परिवार को भी दिल्ली ले आए। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन लॉकडाउन के कारण अब मकान का किराया देना तो दूर, वह दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से जुटा पाते हैं। हालांकि, एक बार फिर सरकार ने कुछ स्पेशल ट्रेनों को चलाने का फैसला किया, जिसके बाद कुली दोबारा यात्रियों का बोझ उठाने स्टेशन पर आ गए हैं। यह पीड़ा सिर्फ समय सिंह की ही नहीं है बल्कि, उन हजारों कुलियों की है जिनका परिवार सिर्फ इसी काम से चलता है।
जागरूकता इतनी कि नहीं हुआ कोई संक्रमित
कोरोना संक्रमण के बीच खुद को खतरे में डालकर कुलियों ने काम दोबारा शुरू तो कर दिया, लेकिन डर यह था कि यात्रियों के सीधे संपर्क में आने से कही वह भी कोरोना की चपेट में न आ जाए। खतरे के बाद भी यह कुली परिवार का भरण-पोषण करने के लिए काम कर रहे हैं। यह जागरूकता का ही असर है कि करीब चार महीने से काम कर रहा एक भी कुली कोरोना की चपेट में नहीं आया। कुलियों का कहना है कि वह कोरोना से तो जंग जीत गए, लेकिन काम न मिलने से आर्थिक हालात खराब हो गए। कुलियों की तरफ से रेल मंत्रालय को पत्र लिखकर कुलियों को आर्थिक मदद देने की भी अपील की गई है।
ऐसे करते हैं बचाव
कुलियों ने बताया कि कोरोना का खौफ सबके अंदर है, लेकिन सब अपना बचाव कर काम कर रहे हैं। रेलवे की तरफ से सैनिटाइज करने की व्यवस्था है। यात्रियों को ट्रेन पर चढ़ाने के बाद वापसी के दौरान वह खुद को सैनिटाइज करते हैं। फिर कुलियों ने मिलकर अपने बैठने वाली जगह पर हाथ धोने के लिए पानी का व्यवस्था कर रखी है।
पीड़ितों की व्यथा
लॉकडाउन के दौरान गांव चले गए थे। वहां कोई कमाई का जरिया नहीं था। ट्रेन चलने के बाद वापस दिल्ली आ गए। उम्मीद थी कि जिंदगी पटरी पर आ जाएगी, लेकिन आधी कमाई होने की वजह से परिवार क्या, अपना गुजर बसर करना भारी पड़ रहा है। सरकार से भी कोई मदद नहीं मिली।
- बुधराम मीणा
कोरोना के डर की वजह से वह राजस्थान के करोली स्थित अपने गांव चले गए थे। फिर इस उम्मीद पर आए की हालात सुधर जाएंगे, लेकिन कमाई कम होने की वजह से घर का किराया और खाना पीने तक की दिक्कत आ गई है।
- रामअवतार मीणा
मेरे परिवार में 10 लोग हैं। कोरोना का भी डर है, लेकिन जान हथेली पर रखकर परिवार का पालन पोषण तो करना ही है। हम अपनी तरफ से सावधानी रखते हैं। भगवान का शुक्र है कि हमारे किसी भी साथी को कोरोना नहीं हुआ है।
- जगमोहन
सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि यात्री आते हैं, लेकिन ज्यादातर यात्री संक्रमित होने की डर की वजह से खुद को हमसे दूर रखते हैं। इस वजह से हमारी कमाई पर असर पड़ा है। सरकार से गुहार लगायी गई है, पता नहीं हमारी मदद होगी भी या नहीं।
- रामकेश योगी
कुलियों को शुरू से ही रेलवे की ओर से सहयोग मिल रहा है। जब महामारी बहुत फैली थी और ट्रेन नहीं चल रही थी, उन्हें लगातार खाना खिला रहे थे। उन्हें पानी मुहैया कराया जा रहा था। स्टेशन पर संक्रमण से बचाव के लिए कई उपाय किए गए हैं। कुली की ओर से आर्थिक पैकेज की मांग मेरे संज्ञान में नहीं है।
- दीपक कुमार, मुख्य जनसंपर्क अधिकारी, उत्तर रेलवे
संक्रमण का असर जानने के लिए उसके स्रोत और वायरल लोड का पता होना बहुत जरूरी है। कुली के संक्रमित न होने के पीछे कई वजह हो सकती हैं। इसमें सबसे पहले उनकी प्रतिरोधक क्षमता भी है। आमतौर पर देखने में आ रहा है कि भारत में कोरोना का दूसरे देशों के मुकाबले असर कम है। इसके पीछे जेनेटिक भी एक वजह हो सकती है, लेकिन इसे साबित करने के लिए एक अध्ययन जरूरी है। यह भी हो सकता है कि कुली संक्रमित के संपर्क में न आएं हों।
-डॉ. सुमेध, वरिष्ठ डॉक्टर, आरएमएल