इसी मोर्चे को थामने वालों में अब आईआईटी के 20 छात्रों का नाम भी जुड़ गया है और इनमें से सबसे युवा नाम है वरुण किशोर। वरुण इन बीसों में सबसे कम उम्र के हैं। याचिका दायर करने वालों में कोई आईआईटी दिल्ली का है तो कोई आईआईटी मुंबई का और कोई आईआईटी खड़गपुर का। कोई अभी आईआईटी में पढ़ रहा है तो कोई बरसों पहले यहां से पढ़ाई कर चुका है। इनमें दो महिलाएं और एक ट्रांसवुमन भी शामिल हैं। इन सबने मिलकर सुप्रीम कोर्ट में धारा-377 के खिलाफ एक याचिका दायर की थी।
रोज-रोज अपमान और भेदभाव
अपनी याचिका में इन्होंने बताया है कि कैसे समलैंगिकता को अपराध ठहराए जाने की वजह से इन्हें हर रोज अपमान और भेदभाव झेलना पड़ता है। इन्होंने अदालत को निजी जिंदगी के किस्से लिखकर भेजे थे और धारा-377 को खत्म करने की अपील की थी और सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस भेजकर उससे जवाब मांगा है।
वरुण ने भी अदालत को वो सब कुछ बताया है जो उन्होंने बीबीसी से बातचीत में बताया। वो तमिलनाडु के एक पढ़े-लिखे मिडिल क्लास परिवार से हैं। खुद को 'नर्ड' (कुशाग्र) कहने वाले वरुण सातवीं क्लास से ही आईआईटी की तैयारी करने लगे थे।
वरुण कहते हैं, "तमिलनाडु में पढ़ाई पर बहुत जोर दिया जाता था। खासकर इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई पर। मेरा बचपन और टीनएज भी कोचिंग और स्कूल की आपाधापी में बीता।" वरुण को अपनी सेक्शुअलिटी का एहसास 11वीं क्लास में हुआ। उन्होंने बताया, "इससे पहले मैं पढ़ाई में ही उलझा रहा और जैसा कि आप जानते हैं, भारत में सेक्स एजुकेशन नाम की कोई चिड़िया है ही नहीं, मुझे भी इन सबके बारे में कुछ मालूम नहीं था।"
'मैं माधवन का दीवाना था'
हालांकि धीरे-धीरे वरुण को एहसास होने लगा था कि वो अपने क्लास के ज़्यादातर लड़कों से अलग हैं. उनके दोस्तों को लड़कियां अच्छी लगती थीं और वो माधवन के दीवाने थे। वरुण ने बताया, "मुझे लड़कियां या उनकी वो बातें आकर्षित नहीं करती थीं जो मेरे दोस्तों को। बहुत कंफ्यूजन था। धीरे-धीरे मैंने इंटरनेट पर पढ़ना शुरू किया और चीजें समझ में आने लगीं। कुछ इस तरह मुझे पता चला कि मैं गे हूं।"
वरुण को अपने गे होने का पता 'सबसे बुरे' वक्त में लगा। ये वो वक्त था जब दिसंबर 2013 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए समलैंगिकता को दोबारा अपराध घोषित कर दिया था। वरुण को इसके ठीक एक महीने पहले अपने बारे में पता चला था।
अभी वो खुद ही परेशान थे कि अखबारों की सुर्खियां और टीवी पर फ़्लैश होने वाली ब्रेकिंग न्यूज चीख-चीखकर ये बताने लगीं कि भारत में समलैंगिकता को फिर से अपराध करार दे दिया गया है। वो बताते हैं, "इन सबने मुझे और डरा दिया। मुझे लगा, ओह गॉड! मैं क्रिमिनल हूं। किसी को पता चल गया तो मुझे जेल में डाल दिया जाएगा। मेरा परिवार मुझे छोड़ देगा...ऐसे न जाने कितने ख्याल मेरे मन में आते थे।"
राहत वाली बात ये रही कि जब वरुण ने अपने पिता को इस बारे में बताया तो उन्होंने उनका माथा चूमा और कहा कि वो हमेशा उनके साथ हैं। हालांकि उनकी मां के लिए ये सब स्वीकार करना आसान नहीं था। उन्हें अब भी लगता है कि ये एक दौर है जो गुजर जाएगा। वैसे वरुण ख़ुद को खुशकिस्मत मानते हैं क्योंकि उनके करीबियों ने हमेशा उनका साथ दिया।
'सॉरी यार! गे के साथ नहीं रह सकता'
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उन्हें भेदभाव झेलना ही नहीं पड़ा। आईआईटी के हॉस्टल में उनके रूममेट को जब पता चला कि वो समलैंगिक हैं तो उन्होंने उनके साथ रहने से साफ इनकार कर दिया। "सॉरी यार! मैं एक गे के साथ कमरा शेयर नहीं कर सकता'' - वरुण को अपने पुराने रूममेट की ये बात आज भी याद है।
उनके मुताबिक आईआईटी जैसी जगह में भी तकरीबन 80 फीसदी लोगों की सोच रूढ़िवादी है। वो कहते हैं, "बेशक, यहां सभी लोग मैथ्स और साइंस में बहुत अच्छे हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वो संवेदनशील भी हैं।"
वरुण क्या चाहते हैं, ये उन्हें अच्छी तरह मालूम है। वो चाहते हैं कि सरकार एलजीबीटी समुदाय के लोगों को दोयम दर्जे का नागरिक मानना बंद करे। वो कहते हैं, "लोगों को लगता है कि हमें सिर्फ सेक्स चाहिए। वो सीधे कहते हैं कि कमरे के अंदर चाहे जिसके साथ सेक्स करो, कौन रोकने-टोकने आएगा? ऐसा बिल्कुल नहीं है। ये सिर्फ सेक्स के बारे में नहीं है।"
वरुण का मानना है कि एलजीबीटी समाज को स्वीकार्यता और इज्जत की जरूरत है। वैसी ही स्वीकार्यता और इज्जत जो बाकी सबको हासिल है। उन्होंने कहा, "हम भी खुलकर प्यार करना चाहते हैं, शादी करना चाहते हैं और घर बसाना चाहते हैं। हमें ये हक क्यों नहीं मिलना चाहिए?"