आप नेता जस्मीन शाह ने कहा कि उपराज्यपाल (एलजी) विनय कुमार सक्सेना ने दिल्ली संवाद और विकास आयोग (डीडीडीसी) कार्यालय से उन्हें हटाने के विवाद को संदर्भित करते समय उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। एलजी के फैसले को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय के समक्ष यह तर्क रखा। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह के समक्ष शाह की और से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव नायर ने कहा कि उन्हें डीडीडीसी के उपाध्यक्ष के कार्यों के निर्वहन से प्रतिबंधित करने के उपराज्यपाल का आदेश पूर्ण रूप से गैरकानूनी है।
नायर ने दलील दी और कहा कि सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ के फैसले और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के कामकाज के लेन-देन के नियमों के अनुसार एलजी को इस मामले को पहले मंत्रिपरिषद के पास भेजना चाहिए था।
उन्होंने कहा कि नियमों के मुताबिक अगर उपराज्यपाल और संबंधित मंत्री के बीच कोई मतभेद है तो उपराज्यपाल सबसे पहले किसी भी मतभेद को बातचीत से सुलझाने का प्रयास करेंगे। यदि राय में अंतर बना रहता है तो उपराज्यपाल को मामले को मंत्रिपरिषद और फिर राष्ट्रपति को संदर्भित करने का निर्देश देना चाहिए था।
उन्होंने कहा जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की संविधान पीठ के फैसले में राय का कहना है कि राय का अंतर एक काल्पनिक अंतर नहीं हो सकता है। बेंच ने कहा है कि व्यापार नियमों के लेन-देन में अनिवार्य कार्रवाई का पालन किया जाना चाहिए। मंत्रिपरिषद के परामर्श के बाद ही मामला राष्ट्रपति के पास जाता है।
वरिष्ठ वकील ने यह भी कहा कि एलजी के पास शाह को प्रतिबंधित करने या उनके कार्यालयों को सील करने के लिए कोई आदेश पारित करने की कोई शक्ति नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसी नियुक्ति करने की शक्तियां केवल मुख्यमंत्री के पास हैं। उन्होंने कहा कि एलजी का आदेश भी इसे स्वीकार करता है और इस प्रकार, केजरीवाल के 8 दिसंबर के आदेश के अनुसार शाह की स्थिति को बहाल किया जाना चाहिए था।नैयर ने इस मामले में अपनी दलीलें पूरी कीं। कोर्ट अब मामले की सुनवाई 15 मार्च को करेगा। अब अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल संजय जैन एलजी के लिए अपनी दलीलें रखेंगे।