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Leh: 30 साल बाद जवान दोरजे मोरुप के शव को नसीब होगी घर की मिट्टी, पत्नी ने कही भावुक बात

Mon, 20 Jul 2026 06:13 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, लेह

सार

30 साल तक दुनिया जिसे सिर्फ ‘ग्रीन बूट्स’ के नाम से जानती रही, उसकी पहचान अब लांस नायक दोरजे मोरुप के रूप में हो चुकी है। डीएनए जांच से पुष्टि होने के बाद उनका पार्थिव शरीर इस साल अक्तूबर तक लद्दाख में उनके परिवार को सौंपा जाएगा। 
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सांकेतिक चित्र - फोटो : ANI
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विस्तार
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माउंट एवरेस्ट की बर्फीली चोटियों पर तीन दशक पहले खोया भारतीय सैनिक आखिर अपने घर लौटने की राह पर है। 30 साल तक दुनिया जिसे सिर्फ ‘ग्रीन बूट्स’ के नाम से जानती रही, उसकी पहचान अब लांस नायक दोरजे मोरुप के रूप में हो चुकी है। डीएनए जांच से पुष्टि होने के बाद उनका पार्थिव शरीर इस साल अक्तूबर तक लद्दाख में उनके परिवार को सौंपा जाएगा। 

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दोरजे मोरुप, शेवांग पाल्जोर और सूबेदार शेवांग समनला 1996 में तिब्बत के उत्तरी मार्ग से माउंट एवरेस्ट फतह करने निकली पहली भारतीय तीन सदस्यीय टीम का हिस्सा थे। 10 मई 1996 को शिखर के पास तीनों भीषण बर्फीले तूफान में फंस गए थे। यह अभियान बाद में 1996 एवरेस्ट त्रासदी के नाम से जाना गया, जिसमें उस सीजन में 12 पर्वतारोहियों की जान गई थी।

दोरजे की पत्नी कोनचोक यांगस्किट (75) अब सुन नहीं सकतीं। वह पति की पेंशन के सहारे हैं। बेटे फुंतसोग दोरजे ने जब उन्हें बताया कि उनके पति का पार्थिव शरीर लाने की तैयारी चल रही है, तो उनकी आंखों से आंसू नहीं थमे। उन्होंने बेटे को कागज पर लिखकर अपनी आखिरी इच्छा जताई, एक बार उन्हें देख लूं, फिर चैन से आखिरी सांस लूंगी। फुंतसोग भारतीय सेना में हैं।
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इतने साल तक तक शव क्यों नहीं लाया जा सका...
दोरजे का पार्थिव शरीर करीब 8,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ‘डेथ जोन’ में है। यहां समुद्र तल की तुलना में केवल करीब 33 प्रतिशत ऑक्सीजन होती है। इतनी ऊंचाई पर हेलिकॉप्टर भी नहीं पहुंच सकते। इसलिए वहां से किसी शव को वापस लाना दुनिया के सबसे कठिन अभियानों में माना जाता है। यही वजह है कि एवरेस्ट पर जान गंवा चुके 340 से अधिक पर्वतारोहियों के शव आज भी वहीं पड़े हैं।

ग्रीन बूट्स नाम से चर्चित हुआ था शव, डॉक्यूमेंट्री भी बनी 
1996 में ब्रिटिश पर्वतारोही और फिल्म निर्माता मैट डिकिन्सन ने पहली बार बर्फ में जमे इस शव का वीडियो बनाया था। बाद में यह दृश्य उनकी डॉक्यूमेंट्री समिट फीवर में भी दिखाया गया। पैरों में हरे रंग के जूते होने के कारण इस शव को ‘ग्रीन बूट्स’ नाम मिला। 

  • एवरेस्ट के उत्तरी मार्ग पर एक छोटी गुफा में पड़ा यह शव वर्षों तक पर्वतारोहियों के लिए रास्ते की पहचान बना रहा। इसी वजह से उस स्थान को भी ‘ग्रीन बूट्स गुफा’ कहा जाने लगा। लंबे समय तक इसे आईटीबीपी के हेड कांस्टेबल शेवांग पाल्जोर का शव माना जाता रहा, लेकिन हाल में हुई डीएनए जांच से स्पष्ट हुआ कि यह दोरजे मोरुप का पार्थिव शरीर है।
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