फोर्टिस अस्पताल के ठीक बगल में मौजूद सेक्टर-62 शताब्दी रेल विहार शहर की पॉश सोसायटियों में से एक है। माना जाता है कि सोसायटी में उच्च तबके के पढ़े लिखे और जागरूक लोग रहते हैं।
बुधवार सुबह हमलावर की गोली से घायल अंजली सीढ़ियों के पास 30 मिनट तक पड़ी रही और लोग उसे घेरकर तमाशा देखते रहे। न तो किसी ने पुलिस को फोन किया और न ही सोसायटी से सटे अस्पताल ले जाने का प्रयास किया।
सुबह 7 बजे अंजली के साथ पीजी में रहने वाली ज्योति कोचिंग जाने के लिए नीचे उतरी तो उसने लोगों की भीड़ के बीच अंजली को जमीन पर गिरा हुआ देखा। ज्योति ने बताया कि भीड़ लगाकर खड़े लोग एक-दूसरे से पूछ रहे थे ‘कौन है ये लड़की। कोई जानता है क्या।’
तीन भाई बहनों में सबसे बड़ी थी अंजली
लेकिन, इनमें से कोई मदद को आगे नहीं आया। वह तुरंत भागकर तीसरी मंजिल स्थित पीजी में गई और साथ में रहने वाली लड़कियों को लेकर आई। इसके बाद वह लोग एक पड़ोसी की कार से ज्योति को फोर्टिस अस्पताल ले गए।
अंजली की मौसी कामिनी भदौरिया के अनुसार, अगर तमाशा देख रहे लोगों ने वक्त पर पुलिस को सूचना दे दी होती या खुद उसे अस्पताल पहुंचा दिया होता तो शायद अंजली की जान बच जाती।
अंजली तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। उसकी एक 15 साल की छोटी बहन और 11 वर्ष का एक छोटा भाई है। अंजली पढ़ाई लिखाई के साथ अन्य गतिविधियों में भी सबसे आगे रहती थी। अंजली के पिता तेजपाल सिंह राठौर यमुना नगर हरियाणा में ही परिवार के साथ रहते हैं। वह यमुना नगर स्थित रेलवे वर्कशॉप में ऑफिस सुपरिंटेंडेंट के पद पर तैनात हैं।
अस्पताल ने भी पुलिस को नहीं दी सूचना
अंजली के साथ पीजी में रहने वाली लड़कियों ने बताया कि वह लोग कार से उसे लेकर फोर्टिस अस्पताल पहुंचे। वहां एक डॉक्टर ने कार में ही अंजली को देखा और उसे मृत घोषित कर शव वापस ले जाने को कह दिया। अस्पताल ने शव को रखने से इंकार कर दिया।
इसके बाद वह लोग अंजली का शव लेकर वापस पीजी आईं। ऐसे में सवाल उठता है कि अंजली के सिर में गोली लगी होने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने उसका शव क्यों नहीं रखा। अस्पताल प्रबंधन को शव रखकर पुलिस को सूचना देनी चाहिए थी। अस्पताल प्रबंधन ने भी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।