मार गई मुझे तेरी जुदाई, डस गई ये तन्हाई, तेरी याद आई फिर आंखों में नींद न आई...। फिल्म जुदाई का यह गीत अनिल व किरण (दोनों परिवर्तित नाम) पर बिलकुल सटीक बैठता है।
दोनों आए तो थे कोर्ट में तलाक लेने और जुदाई के फैसले के अंतिम पायदान पर एक-दूसरे का हाथ थाम फिर से एक होने का फैसला कर लिया। जुदाई और मिलन की यह दास्तां कड़कड़डूमा कोर्ट में दिखी।
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश सरिता बीरबल की अदालत में दंपति के तलाक पर अंतिम जिरह होनी थी, लेकिन इससे पहले ही पति व पत्नी की आंखें भर आईं। इसके बाद उन्होंने अदालत के समक्ष एक साथ रहने की इच्छा जाहिर की और तलाक का मुकदमा वापस लेने का आग्रह किया।
ब्रहमपुरी सीलमपुर निवासी अनिल की शादी 1990 में किरण से हुई थी। अनिल का न्यूज पेपर सप्लाई का काम है जबकि किरण हाउस वाइफ है। शादी के कुछ समय बाद ही किरण व अनिल के बीच तकरार होने लगी। वर्ष 1996 तक दोनों अलग हो गए। इसके बाद कई साल तक समझौते की नाकाम कोशिशें हुईं।
करीब 12 साल बाद 2008 में किरण ने अनिल के खिलाफ दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा व गुजारा भत्ते के कई मुकदमे दायर कर दिए। कोर्ट ने भी सुनवाई के बाद किरण को गुजारा भत्ता दिलवा दिया। पत्नी के अलग होने व मुकदमों का जवाब देने के लिए अनिल ने क्रूरता व परित्याग के आधार पर तलाक का आवेदन दायर कर दिया।
उनकी ओर से अधिवक्ता मनीष श्रीवास्तव ने दलील दी कि आवेदक की पत्नी 1996 से अलग है। उसने कई मुकदमे भी दायर कर रखे हैं। दंपति को अलग हुए 17 साल हो गए हैं और इस रिश्ते के दोबारा जुड़ने की कोई गुंजाइश नहीं है। अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अंतिम जिरह का निर्देश दिया।
दंपति व उनके वकील 17 दिसंबर को अदालत में पेश हुए। उस दिन वकीलों के जिरह शुरू करने से पहले ही अनिल व किरण ने शादीशुदा जिंदगी में वापसी का फैसला कर लिया।