दिल्ली में अदालत ने हाल ही में कहा कि मकान मालिक किराएदार से लीज पर दी गई संपत्ति का कब्जा वापस लेने से इस आधार पर इन्कार नहीं कर सकता है कि परिसर क्षतिग्रस्त हो गया है। जिला न्यायाधीश विनिता गोयल ने एचएस बेदी बनाम भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले हवाला देते हुए कहा कि यह अच्छी तरह से स्थापित है कि मकान मालिक इस आधार पर पट्टे के निर्धारण पर सूट की संपत्ति का कब्जा लेने से इन्कार नहीं कर सकता है कि संपत्ति क्षतिग्रस्त हो गई है या अपनी मूल स्थिति में बहाल नहीं हुई है।
अदालत ने कहा कि किरायेदार से बिना शर्त कब्जा लेने के लिए आगे नहीं आने से मकान मालिक बाद में किरायेदार द्वारा संपत्ति को खाली करने के बाद की अवधि के लिए किराए की वसूली के लिए मुकदमा नहीं कर सकता। अदालत ने दोहराया कि मकान मालिक द्वारा किरायेदार द्वारा प्रस्तावित कब्जे को लेने से इन्कार करने की स्थिति में कब्जा मकान मालिक को दिया गया माना जाएगा। अदालत ने देवयानी इंटरनेशनल लिमिटेड (किरायेदार) के खिलाफ ब्याज सहित 1,52,77,020 रुपये की वसूली के लिए दायर एक मुकदमे में यह फैसला दिया। यह भारत में पिज्जा हट, केएफसी आदि जैसे खाद्य आउटलेट चलाता है।
मकान मालिक-वादी ने, वर्तमान मामले में, दावा किया था कि किरायेदार समय पर किराये का भुगतान करने में विफल रहा था और उन्होंने किराए का भुगतान किए बिना पट्टे की संपत्ति पर कब्जा कर लिया था। दूसरी ओर, किरायेदार ने तर्क दिया कि उसने मकान मालिक को समाप्ति का नोटिस दिया था और तीन महीने का नोटिस देने के बाद समयबद्ध तरीके से परिसर खाली कर दिया था।
इस संबंध में किराएदार ने कोर्ट को यह भी बताया कि उसने खाली हुए परिसर की चाबी मकान मालिक को देने की पेशकश की थी। मकान मालिक ने, हालांकि, लंबित किराये की बकाया राशि और परिसर को नुकसान का हवाला देते हुए चाबियां लेने और कब्जा वापस लेने से इनकार कर दिया।