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मजदूर दिवस: काम मिला तो ठीक, नहीं तो खाली पेट सो गए, उद्योगों की नींव हैं मजदूर

Wed, 01 May 2019 03:13 AM IST
देव कश्यप एसएस अवस्थी, अमर उजाला, नोएडा
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labor Day
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आज मजदूर दिवस है। जिले के करीब एक दर्जन ऐसे स्थान हैं, जहां पर हर रोज सैकड़ों की संख्या में मजदूर काम की तलाश में सुबह खड़े होते हैं। कुछ को तो काम मिल जाता है और कुछ हताश होकर घर चले जाते हैं। काम मिल गया तो घर का चूल्हा जला, नहीं मिला तो खाली पेट सो गए। हजारों मजदूरों के साथ हर दिन ऐसा ही हो रहा है। 

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नोएडा व ग्रेटर नोएडा के विकास में यहां के उद्योगों की बड़ी भूमिका है। देसी व विदेशी करीब आठ हजार कंपनियां हैं और उनमें करीब 10 लाख लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ है। देश के हर कोने से लोग यहां काम कर रहे हैं, लेकिन मजदूरों की सुध लेने वाले उद्योग कम ही हैं। शुरू से ही श्रमिकों के अधिकारों को लेकर भी विवाद होते रहे हैं। कई बार उद्योग व श्रमिकों के बीच संघर्ष हुए जिससे नोएडा-ग्रेटर नोएडा औद्योगिक नगरी की छवि पर भी आंच आई। अगर औद्योगिक संस्थान यह समझ लें कि मजदूर भी सहभागी हैं और ‘मैं’ की जगह ‘हम’ से मिलकर काम हो तो निश्चित ही कंपनियों में श्रमिक विवाद नहीं होंगे।

सीख लेने की जरूरत
मल्टीनेशनल हॉलैंड ट्रैक्टर कंपनी में हजारों श्रमिक काम करते हैं। कंपनी में काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक तरह की ड्रेस व जूते हैं। एक ही तरह का खाना कैंटीन में मिलता है और साथ बैठकर खाते हैं। वहां पर काम करने वाले मजदूर नहीं, बल्कि एसोसिएट कहे जाते हैं। अगर अधिकारी को विदेश में ट्रेनिंग के लिए भेजा जाता है तो श्रमिकों को भी ऐसा ही मौका दिया जाता है। इसी तरह की और देसी व विदेशी कंपनियां हैं, जो मजदूरों व वहां काम करने वाले अधिकारियों में कोई भेदभाव नहीं करती हैं। 
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बेरोजगारी बनती है बड़ी समस्या
प्रोफेसर प्रवीण पचौरी की मानें तो शिक्षा रोजगारपरक जरूरी है। औद्योगिक क्षेत्रों में जरूरत के मुताबिक ऐसी ट्रेनिंग होनी चाहिए, जिससे युवाओं को आसानी से काम मिल सके। गांवों में खेती का काम घटने से युवा शहर की तरफ रोजगार की तलाश में निकलते हैं। पढ़े लिखे युवाओं को काम नहीं मिलता। नोएडा-ग्रेनों में लेबर चौक, हरौला, भंगेल, परी चौक समेत तमाम ऐसे स्थान हैं, जहां पर सैकड़ों युवा काम पाने के लिए सुबह खड़े होेते हैं। किसी को मजदूरी मिल गई तो किसी को नहीं मिलती है। फायदा उद्योग भी उठाते हैं। मोलभाव करने पर कम पैसे में मजदूर मिल जाते हैं तो उद्यमी या अन्य कारोबारी अधिक पैसे क्यों खर्च करेंगे। यही से शोषण की शुरुआत होती है।

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रोजगार छिना तो अपराध बढ़ा

प्रॉपर्टी के जानकार योगेंद्र शर्मा की मानें तो करीब 10 साल पहले जिस वक्त यहां फ्लैट कल्चर शुरू हुआ था तो जिले में करीब 400 बिल्डरों ने जमीन खरीदी और करीब 10 हजार फ्लैट तैयार भी हो गए। ऐसे में लाखों संगठित व असंगठित मजदूरों को यहां काम मिला। जैसे ही बिल्डर दिवालिया होने शुरू तो तो एक-एक करके काम छिनता गया। जब काम नहीं मिला तो किसी ने सड़क पर अवैध रूप से ठेला लगाया तो किसी ने सब्जी की दुकान खोल ली। पूरा शहर अतिक्रमण की चपेट में आ गया। गांवों में सेक्टरों में लोगों ने मकानों की मंजिलें बढ़ा दीं, किराये का धंधा फल-फूल गया। अभी भी हजारों लोग रोजगार की तलाश में हैं। इन्हीं में से काफी युवाओं ने अपराध का रास्ता ही अपना लिया, जिसका शहर के लोग खामियाजा भुगत रहे हैं।

इसलिए मनाते हैं मजदूर दिवस
1 मई 1886 को शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाले श्रमिकों के आंदोलन को शिकागो में कुचल दिया गया था। उस संघर्ष में कई श्रमिकों की जान गई थी। उनकी याद में ही मजदूर दिवस मनाया जाता है।

कुछ बड़ी घटनाएं
- ग्रेनो की ग्रेजियानो कंपनी में श्रमिक-प्रबंधन विवाद में एमडी ललित चौधरी की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।
- 2013 में नोएडा से लेकर ग्रेनो तक श्रमिकों ने कई कंपनियों को आग के हवाले कर दिया था।
- देवू मोटर्स कंपनी श्रमिक विवाद के कारण ही बंद हुई।

श्रमिकों को विभिन्न योजनाओं का लाभ देते हुए 2,75,17,349 रुपये की राशि से श्रमिकों को लाभान्वित किया है। पंजीकृत श्रमिकों की संख्या 1,81,292 है। शोषित श्रमिकों को उनके लाभ दिलाए जा रहे हैं। - प्रभाकर मिश्र, सहायक श्रमायुक्त गौतमबुद्घनगर

जब मजदूरों को हर सुविधा मिलेगी तो विवाद नहीं होंगे। कंपनियों में अच्छे ढंग से काम होगा। मजदूरों के सुख दुख में साथ देने से अपनापन आएगा तो उद्यमियों व श्रमिकों के लिए अच्छा है। यही उद्यमियों को बताता रहता हूं। - आदित्य घिडिल्याल, अध्यक्ष ग्रेनो इंडस्ट्री एसोसिएशन

श्रमिकों के साथ अन्याय न हो, इसके लिए पूरा प्रयास किया जाता रहता है। कंपनियों में अच्छा वातावरण होगा तो उत्पादन भी बढ़ेगा। उसी हिसाब से श्रमिकों को हक देने का प्रयास किया जाता है। श्रमिकों का हक छीनना नहीं, देना चाहिए। - विपिन मल्हन, अध्यक्ष, नोएडा इंट्रेप्रिन्योर्स एसोसिएशन

बेरोजगारी बढ़ने से मजदूर दयनीय स्थिति में हैं। ठेकेदारी बढ़ने से न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता। मजदूरों से आठ घंटे की जगह 12 घंटे काम लिया जाता है। महंगाई के कारण एक कमरे में 10 मजदूर रहते हैं। आधे रात में काम करते हैं तो आधे दिन में।  सरकारें भी मदद नहीं कर रही हैं। आज काम लिया कल निकाल दिया, यही श्रमिकों के साथ हो रहा है।
- गंगेश्वर दत्त शर्मा, अध्यक्ष सीटू
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